यूरोप में Jet Fuel का स्टॉक चिंताजनक: 6 हफ्ते की बची सप्लाई
IEA के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर फातिह बिरोल (Fatih Birol) ने साफ कर दिया है कि मौजूदा तेल की कीमतें ($95-$96 प्रति बैरल ब्रेंट क्रूड) इस संकट की गंभीरता को नहीं दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि यह पिछले एनर्जी क्राइसिस से बिलकुल अलग है, जहाँ 1970 के दशक में मार्केट फियर्स (market fears) एक वजह थे। यह इस बार फिजिकल सप्लाई लॉस (physical supply loss) का सबसे बड़ा मामला है, जिसने तेल की कीमतों को $100 और $120 प्रति बैरल तक पहुंचा दिया था।
सिर्फ Flight पर नहीं, पूरी इकोनॉमी पर पड़ेगा असर
Jet Fuel की कमी का सीधा असर यूरोप में हवाई यात्राओं (air travel) पर पड़ेगा, लेकिन इसका असर हवाई जहाजों से कहीं ज्यादा व्यापक है। मार्च में ग्लोबल ऑयल सप्लाई (Global oil supply) में 10.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी आई, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। इस वजह से मिडिल ईस्ट (Middle East) और एशिया (Asia) की रिफाइनरी (refineries) को अपना प्रोडक्शन कम करना पड़ा है। IEA का अनुमान है कि 2026 में ग्लोबल ऑयल डिमांड (global oil demand) 80,000 बैरल प्रतिदिन घट जाएगी। यह पिछली ग्रोथ फोरकास्ट (growth forecasts) से बिलकुल उलट है और कोविड-19 पेंडेमिक के बाद सबसे बड़ी गिरावट होगी। इसका असर पेट्रोकेमिकल्स (petrochemicals), फर्टिलाइजर्स (fertilizers) और एल्युमीनियम (aluminum) जैसे मार्केट्स पर भी पड़ेगा।
दुनिया भर की इकोनॉमी पर गिरेगी मार
मिडिल ईस्ट में जियोपॉलिटिकल टर्बुलेंस (geopolitical turmoil) दुनिया भर की इकोनॉमी के फोरकास्ट पर भारी पड़ रहा है। IMF का अनुमान है कि 2026 तक ग्लोबल इन्फ्लेशन (global inflation) 4.4% तक पहुँच सकती है, और बढ़ी हुई एनर्जी प्राइसेस इसे 5.4% तक ले जा सकती हैं। ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ (Global economic growth) भी 2026 में घटकर 3.1% के आसपास रह सकती है। खासकर इमर्जिंग और डेवलपिंग इकोनॉमी (emerging and developing economies) पर इसका सबसे ज्यादा असर होगा, क्योंकि ये एनर्जी इम्पोर्ट्स (energy imports) पर ज्यादा निर्भर करती हैं और इनके पास कमजोर फाइनेंशियल सेफ्टी नेट (financial safety nets) हैं। IEA द्वारा स्ट्रेटेजिक रिजर्व्स (strategic reserves) से 400 मिलियन बैरल तेल निकाला गया था, लेकिन यह सिर्फ तत्काल राहत है, असली समस्या का हल नहीं।
सप्लाई रिस्क: क्या है आगे का रास्ता?
IEA को उम्मीद है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से सप्लाई फ्लो (supply flows) मई तक फिर से सामान्य हो सकता है। लेकिन, इसकी संभावना अभी बहुत अनिश्चित है। अमेरिका (US) द्वारा ईरान (Iran) के पोर्ट्स की की गई नेवल ब्लॉकएड (naval blockade) भी एक बड़ी दिक्कत है, जिससे ईरान का ऑयल एक्सपोर्ट (oil export) प्रभावित हो रहा है। यह ब्लॉकएड और स्ट्रेट का बंद होना, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (Gulf Cooperation Council) के देशों के लिए बड़े खतरे की घंटी है। मार्केट की मौजूदा प्राइसिंग (market pricing) शायद यह नहीं समझ पा रही कि यह क्राइसिस कब तक खिंच सकता है। कई रीजनल एनर्जी एक्सपोर्टर्स (energy exporters) के पास कोई वैकल्पिक रूट (alternative routes) नहीं है, सिवाय सऊदी अरब (Saudi Arabia) और UAE के जिनके पास कुछ सीमित विकल्प हैं।
आगे क्या होगा?
IEA के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से सामान्य सप्लाई फिर से शुरू होना ही ग्लोबल एनर्जी प्रेशर (global energy pressures) को कम करने और इकोनॉमी को स्थिर करने का सबसे बड़ा फैक्टर होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो ऑयल डिमांड (oil demand) और भी तेजी से गिर सकती है, जिससे कुल तेल का इस्तेमाल कम हो जाएगा। STOXX यूरोप टोटल मार्केट एयरलाइंस इंडेक्स (STOXX Europe Total Market Airlines index) पहले ही इस साल 13.369% गिर चुका है, जो मार्केट की चिंता को दिखाता है। बढ़ती फ्यूल कॉस्ट (fuel costs) और संभावित फ्लाइट कैंसिलेशन (flight cancellations) से आगे और दबाव बढ़ने की उम्मीद है। जारी कॉन्फ्लिक्ट (conflict) और US ब्लॉकएड ग्लोबल ग्रोथ और इन्फ्लेशन फोरकास्ट के लिए बड़े रिस्क पैदा कर रहे हैं, जिससे पॉलिसीमेकर्स के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं।