जुलाई 2026 में भारत ने इंडस्ट्रियल गैस राशनिंग हटा दी थी, लेकिन मिडिल ईस्ट में ताजा तनाव ने एक बार फिर मार्केट की चिंता बढ़ा दी है। फर्टिलाइजर और स्टील जैसे एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर पर अब निवेशकों की पैनी नजर है।
भारतीय शेयर बाजारों पर एक बार फिर भू-राजनीतिक (geopolitical) तनाव का दबाव साफ दिख रहा है। हालांकि, इस साल की शुरुआत में भारत ने मुश्किल दौर को पार कर लिया था, लेकिन इंडस्ट्रियल गैस राशनिंग की यादें निवेशकों को सतर्क कर रही हैं।
पिछले संकट से सबक
साल 2026 की पहली छमाही, खासकर मार्च से जून के बीच, सरकार को इमरजेंसी नियमों के तहत सिटी गैस और ट्रांसपोर्ट फ्यूल को प्राथमिकता देनी पड़ी थी। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यवधान के कारण रिफाइनरी, फर्टिलाइजर प्लांट और भारी उद्योगों के लिए गैस की सप्लाई रोकनी पड़ी थी। उस दौरान भारत के 50% से 60% LNG और LPG आयात इन्हीं रूटों पर निर्भर थे। हालांकि 5 जुलाई, 2026 को यह राशनिंग खत्म कर दी गई थी, लेकिन यह घटना भारत की एनर्जी सुरक्षा की कमजोरी को उजागर कर गई थी।
कंपनियों के मार्जिन पर असर
बाजार में इस समय एनर्जी कॉस्ट को लेकर अनिश्चितता है। केमिकल्स, स्टील और फर्टिलाइजर जैसी कंपनियों के लिए गैस एक बड़ा ऑपरेशनल खर्चा है। अगर सप्लाई में रुकावट आती है या वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ती हैं, तो ये कंपनियां इन बढ़े हुए खर्चों का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, जिससे उनके मुनाफे पर तगड़ा असर पड़ता है।
आगे क्या होगा?
बाजार की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ कीमत नहीं, बल्कि सप्लाई की स्थिरता है। भारतीय अर्थव्यवस्था आयातित नेचुरल गैस पर काफी निर्भर है, इसलिए मिडिल ईस्ट में कोई भी लंबा संघर्ष कॉर्पोरेट अर्निंग्स के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। निवेशकों की नजर अब इस क्षेत्र के राजनयिक घटनाक्रमों, क्रूड ऑयल और LNG की कीमतों पर टिकी है। फिलहाल, मजबूत बैलेंस शीट वाली और एनर्जी एफिशिएंसी पर फोकस करने वाली कंपनियां ही इस उतार-चढ़ाव को झेलने में सक्षम होंगी।
