राजस्थान स्थित एक हाइड्रोपोनिक फार्म में ग्रिड की अस्थिरता के कारण प्रोडक्शन में **62%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस घटना के बाद भारतीय कृषि क्षेत्र में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की मांग ने जोर पकड़ लिया है, जिससे अब इसे सिर्फ बैकअप नहीं, बल्कि अनिवार्य इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में देखा जा रहा है।
संकट में हाई-टेक फार्मिंग
भारत में आधुनिक कृषि तकनीक और ग्रामीण बिजली की सप्लाई के बीच का अंतर अब साफ दिखने लगा है। राजस्थान की कंपनी E-Foods का मामला इसका ताजा उदाहरण है, जहां ग्रिड की अस्थिरता ने 4.7 MW की सोलर क्षमता होने के बावजूद कंपनी को ठप कर दिया। ग्रिड-टाइड सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण, मुख्य बिजली सप्लाई कटते ही कंपनी का पूरा सिस्टम ऑटोमैटिक शट-डाउन मोड में चला गया, जिससे भीषण गर्मी के बीच प्रोडक्शन को भारी चोट पहुंची।
BESS: अब जरूरत, न कि लग्जरी
बिजली के बार-बार कटने से किसान अक्सर डीजल जनरेटर पर निर्भर रहते हैं, लेकिन यह तरीका न केवल महंगा है बल्कि उपकरणों को भी नुकसान पहुंचाता है। अब इंडस्ट्री का रुख Battery Energy Storage Systems (BESS) की ओर तेजी से मुड़ रहा है। यह तकनीक दिन में पैदा हुई सोलर ऊर्जा को स्टोर करने की सुविधा देती है, जिससे ग्रिड फेल होने या रात के समय भी सिंचाई पंप, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स बिना रुके काम कर सकें।
ग्रामीण भारत में नई पहल
इस ऊर्जा संकट को दूर करने के लिए अब बड़े स्तर पर प्रयोग हो रहे हैं। अमरावती में Maharashtra Energy Development Agency, और उत्तर प्रदेश व बिहार में Smart Power India तथा The Rockefeller Foundation के सहयोग से स्टोरेज-बैक्ड माइक्रोग्रिड्स पर काम चल रहा है। यह प्रोजेक्ट्स स्मार्ट सॉफ्टवेयर के जरिए लोड मैनेजमेंट कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े कृषि निवेशों की सफलता इसी बात पर टिकी है कि हम कितनी प्रभावी ढंग से स्थानीय स्तर पर बिजली पैदा और स्टोर कर पाते हैं। जैसे-जैसे बैटरी की लागत कम होगी, यह तकनीक डीजल पर निर्भरता को खत्म कर कृषि उत्पादों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।
