ईरान में चल रहे विवाद के चलते दुनियाभर में एनर्जी सेक्टर पर **$330 बिलियन** का बोझ पड़ा है। इस संकट ने देशों को रिन्यूएबल और ट्रेडिशनल फ्यूल के बीच संतुलन बनाने पर मजबूर कर दिया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे देशों की इकॉनमी पर भी पड़ रहा है।
एनर्जी का बदलता स्वरूप
ईरान में जारी तनाव ने ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी को पूरी तरह से बदल दिया है। जो मुद्दा कभी केवल क्लीन पावर की ओर बढ़ने का था, आज वह 'नेशनल सिक्योरिटी' का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। 1990 के गल्फ वॉर के बाद यह सबसे बड़ा प्राइस शॉक है, जिसमें दुनिया भर के इंपोर्टर्स को $330 बिलियन का भारी नुकसान झेलना पड़ा है।
भारत के लिए चुनौतियां
भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस के जरिए पूरा करते हैं, उनके लिए यह अस्थिरता चिंता का विषय है। ग्लोबल स्तर पर कीमतों में उछाल सीधे तौर पर देश की महंगाई और ट्रेड बैलेंस पर असर डालती है। सरकार पर फ्यूल की कीमतों को काबू में रखने का दबाव बढ़ जाता है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए फंड की उपलब्धता पर भी असर पड़ता है।
सरकारों की 'ड्युअल-ट्रैक' पॉलिसी
दुनियाभर की सरकारें अब एक बीच का रास्ता अपना रही हैं। रिन्यूएबल एनर्जी पर जोर देने के साथ-साथ पारंपरिक हाइड्रोकार्बन सेक्टर को भी सपोर्ट दिया जा रहा है, ताकि सप्लाई में कोई कमी न आए। इसके बावजूद, साल 2026 की पहली छमाही में विंड और सोलर सेक्टर में निवेश कम हुआ है।
निवेशकों के लिए बड़ी सीख
यह बदलाव आसान नहीं है। साल 2026 की पहली छमाही में ग्रीनहाउस गैस एमिशन में 0.2% की बढ़त देखी गई है। हालांकि, जिन देशों ने समय रहते क्लीन एनर्जी पर दांव लगाया, उन्होंने फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करके अब तक $36 बिलियन की बचत की है। आने वाले समय में निवेशकों को सरकारी सब्सिडी, इंफ्रास्ट्रक्चर स्पेंडिंग और एनर्जी कंपनियों की उस क्षमता पर नजर रखनी चाहिए, जिससे वे रिन्यूएबल और ट्रेडिशनल सप्लाई के बीच संतुलन बना सकें।
