भारत के पावर सेक्टर पर El Niño का असर देखने को मिल सकता है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अगले बारह महीनों में कोयला आधारित बिजली उत्पादन में **18 TWh** तक की वृद्धि हो सकती है। यह बढ़ोतरी गर्मी बढ़ने से कूलिंग की बढ़ी हुई मांग और विंड व हाइड्रो पावर में कमी के कारण होने की आशंका है।
मौसम का पावर जनरेशन पर असर
El Niño की दस्तक भारत के एनर्जी मिक्स को प्रभावित करने वाली है। CREA की रिपोर्ट बताती है कि अगले बारह महीनों में जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन में 17.7 टेरावाट आवर (TWh) की बढ़ोतरी हो सकती है। यह स्थिति ऐसे समय में है जब चरम मौसम के दौरान बिजली की सप्लाई बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि पीक डिमांड (विशेष रूप से कूलिंग के लिए) अक्सर नॉन-फॉसिल सोर्स की क्षमता से ज्यादा हो जाती है।
'ट्रिपल थ्रेट' का सामना
कोयले से चलने वाले बिजलीघरों में उत्पादन बढ़ने का अनुमान सिर्फ ऊर्जा की कमी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह ग्रिड को प्रभावित करने वाले 'ट्रिपल थ्रेट' का परिणाम है। सबसे पहले, बढ़ते तापमान से एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन के कारण कुल बिजली मांग में लगभग 10 TWh की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। दूसरे, कमजोर मॉनसून की आशंका के चलते हाइड्रो पावर जनरेशन में 2.9 TWh की कमी आ सकती है। तीसरा, विंड पावर आउटपुट में भी 4.9 TWh की कमी का अनुमान है। इन सभी कारकों के मेल से एक डिमांड-सप्लाई गैप बनेगा, जिसे मौजूदा समय में थर्मल पावर प्लांट से ही भरा जाएगा।
रिन्यूएबल एनर्जी की राह में मुश्किलें
यह स्थिति कोयले पर अस्थायी निर्भरता बढ़ा सकती है, लेकिन भारत की लंबी अवधि की एनर्जी ट्रांजिशन योजनाएं अभी भी जारी हैं। पिछले साल भारत ने 44.6 गीगावाट (GW) की सोलर क्षमता जोड़ी थी, जिससे 2026 के पहले पांच महीनों में कुछ राहत मिली थी। इस दौरान, रिकॉर्ड तोड़ बिजली मांग के बावजूद, सोलर पावर की उपलब्धता में 33% की वृद्धि के कारण थर्मल जनरेशन 2024 के स्तर से नीचे रहा। हालांकि, El Niño के प्रभाव से थर्मल एसेट्स की विश्वसनीयता ग्रिड स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी में कमी
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल सोलर और विंड क्षमता बढ़ाना इन मौसम-जनित झटकों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। पिछले साल, ग्रिड ऑपरेटर्स को 2.1 TWh की रिन्यूएबल बिजली को डायवर्ट करना पड़ा था, क्योंकि कोयला आधारित प्लांट के संचालन को बनाए रखते हुए इसे एकीकृत करने के लिए सिस्टम में पर्याप्त फ्लेक्सिबिलिटी नहीं थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गैप को पाटने के लिए बैटरी स्टोरेज का एकीकरण आवश्यक है। अनुमान है कि केवल 10 गीगावाट आवर (GWh) की बैटरी स्टोरेज क्षमता से अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को पीक शाम के घंटों के लिए स्टोर किया जा सकता था, जिससे कोयला प्लांट पर निर्भरता कम हो सकती थी।
निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए, यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भारत के एनर्जी इवोल्यूशन के अगले चरण में ग्रिड आधुनिकीकरण और एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस पर खर्च बढ़ने की संभावना है। बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, पावर ट्रांसमिशन इक्विपमेंट और स्मार्ट ग्रिड टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियां मौसम-प्रतिरोधी पावर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल पावर क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, ग्रिड की इन डिमांड शॉक को मैनेज करने की क्षमता एक प्रमुख निगरानी बिंदु बनी रहेगी।
