El Niño से मांग बढ़ी, पर कीमतों में गिरावट का खेल
भारत का बिजली क्षेत्र एक दिलचस्प स्थिति से गुजर रहा है। एक ओर El Niño और मज़बूत आर्थिक विकास के कारण बिजली की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, तो दूसरी ओर बाज़ार में आपूर्ति (supply) की अधिकता के चलते कीमतें गिर रही हैं। यह मांग और आपूर्ति के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है, जहाँ पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है, भले ही रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) का विस्तार हो रहा हो।
मांग में उछाल और बाज़ार का विरोधाभास (Market Paradox)
Crisil Intelligence का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत की बिजली की मांग 5.5% से 6.5% तक बढ़ सकती है, जो 1,815 से 1,825 बिलियन यूनिट तक पहुँच सकती है। El Niño की वजह से तापमान में वृद्धि और कम बारिश से कूलिंग (cooling) की ज़रूरतें बढ़ेंगी, जो इस मांग को और बढ़ाएंगी। इसके साथ ही, लगातार आर्थिक विकास (economic growth) भी मांग को सहारा दे रहा है। मार्च महीने में बिजली की खपत एक रिकॉर्ड 149 बिलियन यूनिट तक पहुंच गई, जो पिछले साल की तुलना में 1.3% ज़्यादा है। इसी के अनुरूप, रियल-टाइम इलेक्ट्रिसिटी मार्केट (RTM) में ट्रेडिंग की मात्रा (volume) मार्च में साल-दर-साल 41.7% बढ़कर 5,283 मिलियन यूनिट हो गई।
लेकिन, इस तेज़ी के बावजूद, RTM में बिजली की औसत क्लीयरिंग प्राइस (average clearing price) साल-दर-साल 10% गिरकर ₹3.71 प्रति यूनिट पर आ गई। यह स्थिति बताती है कि मांग में अचानक वृद्धि को पूरा करने के लिए पर्याप्त जनरेशन कैपेसिटी (generation capacity) उपलब्ध है, जिसमें थर्मल पावर (thermal power) का बड़ा योगदान है, भले ही रिन्यूएबल एनर्जी का एकीकरण (integration) जारी हो।
कोयले की भूमिका अब भी अहम
रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में तेज़ी से विस्तार के बावजूद, भारत की बिजली उत्पादन में कोयला (coal) अभी भी केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। वित्त वर्ष 2026 में 50.9 GW नई रिन्यूएबल क्षमता जोड़ी गई। लेकिन मार्च में, कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन में थोड़ी वृद्धि हुई, जिससे कुल उत्पादन मिश्रण (mix) में इसकी हिस्सेदारी लगभग 73% तक पहुँच गई, जो वित्त वर्ष 2026 के औसत 68% से ज़्यादा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वित्त वर्ष 2025 में घरेलू ऊर्जा का लगभग 79% कोयले से आया था। कोयले पर यह निरंतर निर्भरता इसकी लचीलेपन (flexibility) के कारण है, जो मांग में उतार-चढ़ाव को पूरा करने के लिए उत्पादन को तेज़ी से बढ़ा सकता है और ग्रिड स्थिरता (grid stability) प्रदान करता है।
बिजली क्षेत्र में छिपे जोखिम
RTM कीमतों में गिरावट से दिख रही आपूर्ति की प्रचुरता, कुछ अंदरूनी जोखिमों को छिपाती है। सबसे बड़ा जोखिम कोयले पर भारत की भारी निर्भरता है, जिससे उत्सर्जन (emissions) बढ़ता है और थर्मल प्लांटों में इस्तेमाल होने वाले आयातित ईंधन (imported fuels) की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का खतरा बना रहता है। रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के तेज़ी से बढ़ने के बावजूद, ग्रिड को अधिक लचीलापन, स्टोरेज समाधान (storage solutions) और ट्रांसमिशन अपग्रेड (transmission upgrades) की आवश्यकता है ताकि इन रुक-रुक कर होने वाले स्रोतों को प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जा सके। El Niño जैसे जलवायु संबंधी घटनाएँ, जहाँ बिजली की मांग बढ़ा सकती हैं, वहीं कमज़ोर मानसून (monsoon) के कारण हाइड्रो पावर (hydro power) उत्पादन में कमी आ सकती है, जिससे थर्मल और गैस-आधारित प्लांटों पर निर्भरता बढ़ेगी।
भारत के एनर्जी बाज़ार का भविष्य
आर्थिक वृद्धि की बात करें तो Goldman Sachs के अनुसार 2026 में रियल GDP लगभग 6.9% और 2027 में 6.8% रहने का अनुमान है। Crisil ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 7.1% की वृद्धि का अनुमान लगाया है। यह वृद्धि बिजली की मज़बूत मांग को बनाए रखेगी। Bernstein ने भारत की बिजली मांग वृद्धि (power demand growth) के आउटलुक को बढ़ाया है, जिसमें डेटा सेंटरों (data centers) की बढ़ती भूमिका का भी ज़िक्र है। ICRA को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में मांग वृद्धि लगभग 5% तक बढ़ सकती है। मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल डीकार्बोनाइजेशन (industrial decarbonisation), बैटरी स्टोरेज (battery storage) और कार्बन कैप्चर (carbon capture) पर ध्यान, एक अधिक नीति-संचालित ऊर्जा परिवर्तन (policy-driven energy transition) का संकेत देता है। हालाँकि, सेक्टर को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (geopolitical uncertainties), कमोडिटी (commodity) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और El Niño जैसे जलवायु जोखिमों का प्रबंधन करना होगा ताकि बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए विश्वसनीय और किफायती बिजली सुनिश्चित की जा सके।