European Commission अपनी मीथेन एमिशन रेगुलेशन की डेडलाइन को **2027** से आगे बढ़ाकर **2028** करने पर विचार कर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव के बीच इस कदम का मकसद एनर्जी सप्लाई को सुचारू बनाए रखना है, जिससे भारत जैसी इंपोर्टर इकोनॉमीज को बड़ी राहत मिल सकती है।
नियम में बदलाव क्यों?
यूरोपीय आयोग (European Commission) उन कड़े नियमों को टालने की तैयारी में है जो मूल रूप से जनवरी 2027 से लागू होने वाले थे। इन नियमों के तहत तेल और गैस इंपोर्ट करने वाली कंपनियों को मीथेन उत्सर्जन का खुलासा करना अनिवार्य था। नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनी के सालाना टर्नओवर का 20% तक जुर्माना लग सकता था। हालांकि, अब भू-राजनीतिक तनाव और एनर्जी सिक्योरिटी के चलते इसे 2028 तक खिसकाने पर चर्चा हो रही है।
भारत के लिए इसके मायने
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा LNG के जरिए पूरा करता है। यदि यूरोप अपने नियमों में सख्ती बरतता, तो ग्लोबल मार्केट में गैस की सप्लाई कम होने और कीमतें बढ़ने का डर था। Petronet LNG, GAIL और Reliance Industries जैसी भारतीय कंपनियों के लिए यह खबर राहत भरी है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर गैस सप्लाई स्थिर रहने से कीमतों में अचानक उछाल की संभावना कम हो जाएगी।
इंडस्ट्री की चुनौतियां
Wood Mackenzie जैसी फर्मों का मानना है कि मीथेन मॉनिटरिंग के लिए अभी ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह तैयार नहीं है। ExxonMobil जैसी दिग्गज कंपनियों ने भी इस पर चिंता जताई है। हालांकि इसे लागू करने के लिए अभी European Parliament और सदस्य देशों की औपचारिक मंजूरी बाकी है, लेकिन इस डेडलाइन बदलाव की चर्चा ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट को बड़ी राहत दी है।
