ईरान संघर्ष के कारण यूरोप में ऊर्जा की कीमतों में उछाल की आशंका है, जिसके चलते वहां तुरंत खपत कम करने के आदेश दिए गए हैं। भारतीय निवेशकों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि इससे ऑयल इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और एविएशन व केमिकल जैसे सेक्टर्स के मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
यूरोपियन यूनियन ने ईरान-इजरायल संघर्ष के चलते वैश्विक ऑयल और गैस सप्लाई चेन में आने वाली दिक्कतों को लेकर चेतावनी जारी की है। EU एनर्जी कमिश्नर डैन जोर्गेंसन ने सभी सदस्य देशों से ऊर्जा की खपत तुरंत घटाने को कहा है, ताकि आने वाली सर्दियों के लिए गैस स्टोरेज पूरी तरह भरा रहे।
हालांकि, 2021 के मुकाबले अभी वहां गैस का स्टॉक बेहतर स्थिति में है, लेकिन मार्केट अभी भी अस्थिर बना हुआ है। इसी वजह से सरकारों को बिजली और गैस के इस्तेमाल पर सख्ती बरतने की सलाह दी गई है ताकि आम जनता और इंडस्ट्री को कीमतों में होने वाली अचानक वृद्धि से बचाया जा सके।
भारतीय बाजारों पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल और नेचुरल गैस के रूप में इंपोर्ट करता है। वैश्विक स्तर पर कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। इसके कारण तीन बड़े रिस्क उभर सकते हैं: महंगाई का बढ़ना, रुपये में कमजोरी और सरकारी खजाने यानी फिजिकल डेफिसिट (Fiscal Deficit) पर दबाव।
निवेशकों के लिए काम की बात
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum पर ग्लोबल कीमतों का सीधा असर पड़ता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इन कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव आ सकता है। वहीं, एविएशन और फर्टिलाइजर सेक्टर भी इससे अछूते नहीं रहेंगे।
इतना ही नहीं, ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से देश में रिटेल महंगाई बढ़ सकती है, जो Reserve Bank of India को ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर सकती है। आने वाले समय में निवेशकों की नजर Brent Crude की कीमतों पर होनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेगा कि भारतीय इकोनॉमी और कॉर्पोरेट प्रॉफिटेबिलिटी पर इसका कितना बड़ा असर पड़ता है।
