अक्टूबर के पहले पखवाड़े में भारत में डीजल की खपत में **25.4%** की बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। त्योहारी सीजन और कृषि गतिविधियों के कारण डीजल की मांग **3.65 मिलियन मीट्रिक टन** तक पहुंच गई है। हालांकि, सरकारी तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ है क्योंकि वे **₹20 प्रति लीटर** का नुकसान उठाकर कीमतों को स्थिर बनाए हुए हैं, जिससे ग्राहक प्राइवेट रिटेलर्स से दूर हो रहे हैं।
बाजार का हाल और सरकारी कंपनियों पर असर
अक्टूबर के शुरुआती आधे हिस्से में डीजल की बिक्री में 25.4% की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मांग में आई इस तेजी का मुख्य कारण त्योहारी सीजन के लिए लॉजिस्टिक्स की तैयारी और खेती के कामों में डीजल का बढ़ता इस्तेमाल है। सरकारी तेल कंपनियों जैसे Indian Oil Corp, Bharat Petroleum, और Hindustan Petroleum के लिए यह वॉल्यूम ग्रोथ तो अच्छी है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी वित्तीय चुनौती भी है।
कंपनियों ने मई से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, जिससे उन्हें प्रति लीटर ₹20 का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसका असर मार्केट शेयर पर भी दिख रहा है, जहां ग्राहक Reliance Industries और Nayara Energy जैसे प्राइवेट रिटेलर्स को छोड़कर सरकारी पंपों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि प्राइवेट कंपनियां मार्केट-लिंक्ड कीमतों पर ईंधन बेच रही हैं।
मांग बढ़ाने वाले फैक्टर्स
डीजल की खपत बढ़ने के पीछे केवल त्योहार ही नहीं, बल्कि कमर्शियल व्हीकल सेक्टर की मजबूती भी है। सितंबर में ट्रकों की बिक्री 44,323 यूनिट्स रही, जो अगस्त के मुकाबले 33.57% ज्यादा है। इसके अलावा, पावर सेक्टर में भी बिजली उत्पादन के लिए डीजल की मांग लगातार बनी हुई है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों के लिए स्थिति थोड़ी मिली-जुली है। जहां बढ़ती बिक्री मांग में मजबूती दिखाती है, वहीं सरकारी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव साफ है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें कब तक अस्थिर रहती हैं और सरकार कीमतों को संतुलित करने के लिए क्या कदम उठाती है। निवेशकों को आने वाली तिमाही के नतीजों और सरकारी नीतियों पर करीबी नजर रखनी चाहिए।
