दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) ने इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। नए नियमों के तहत, चार्जिंग स्टेशनों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत को अब केंद्रीय सब्सिडी (Central Subsidy) से कवर किया जाएगा, जिससे आम उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
क्या हुआ है?
दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) ने 1 जुलाई, 2026 को एक नया आदेश जारी किया है। इसका मकसद इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) चार्जिंग स्टेशनों के विस्तार में आ रही रुकावटों को दूर करना है। नए नियमों के मुताबिक, जरूरी अपस्ट्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे ट्रांसफार्मर, केबल और कंट्रोल सिस्टम की स्थापना का खर्च अब केंद्र सरकार की PM E-DRIVE स्कीम से उठाया जाएगा। इससे पहले, इन खर्चों को अक्सर बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) के कुल खर्च में जोड़ दिया जाता था, जिससे आम ग्राहकों के बिजली टैरिफ (Tariff) पर दबाव पड़ने की आशंका रहती थी। DERC के इस कदम से अब घरों को कमर्शियल EV इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के वित्तीय बोझ से बचाया गया है।
बिज़नेस के लिए क्यों है यह अहम?
पिछली व्यवस्था में चार्जिंग पॉइंट ऑपरेटर्स को 70% तक की सब्सिडी क्लेम करने में काफी देरी और कन्फ्यूजन का सामना करना पड़ता था। चूंकि ये लागतें Discoms की कुल रेवेन्यू (Revenue) की जरूरत से जुड़ी थीं, इसलिए इन्हें सीधे सब्सिडी के लिए अलग करना मुश्किल था। DERC के नए आदेश ने इस अस्पष्टता को खत्म कर दिया है। अब Discoms एक अप्रूव्ड कॉस्ट डेटा बुक का इस्तेमाल करके इन खर्चों की गणना अलग से करेंगे। प्राइवेट डेवलपर्स और चार्जिंग नेटवर्क ऑपरेटर्स के लिए, यह कॉस्ट रिकवरी (Cost Recovery) का एक स्पष्ट रास्ता खोलता है, जिससे दिल्ली में नए चार्जिंग प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल वायबिलिटी (Financial Viability) में सुधार हो सकता है।
नेटवर्क के गैप को भरना
दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड (DTL), जो PM E-DRIVE प्रोग्राम के लिए नोडल एजेंसी है, ने मई 2026 में इस मुद्दे को उठाया था। DTL ने कहा था कि अगर खास रेगुलेटरी छूट नहीं मिलती, तो कमर्शियल EV साइट्स के लिए जरूरी नेटवर्क स्ट्रेंथनिंग (Network Strengthening) Discoms के लिए एक वित्तीय देनदारी बनी रहेगी। अपस्ट्रीम लागतों को एनुअल रेवेन्यू रिक्वायरमेंट कैलकुलेशन (Annual Revenue Requirement Calculation) से बाहर रखने का आदेश देकर, DERC ने राज्य-स्तरीय ऑपरेशन्स (Operations) को केंद्रीय सब्सिडी दिशानिर्देशों के साथ प्रभावी ढंग से सिंक्रोनाइज़ (Synchronize) कर दिया है। उम्मीद है कि इससे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स (Providers) के लिए डिमांड नोट (Demand Note) की प्रक्रिया आसान होगी और नए चार्जिंग यूनिट्स के लगने की रफ्तार बढ़ेगी।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
हालांकि यह रेगुलेटरी बदलाव इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स के लिए एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इस सेक्टर पर इसका लॉन्ग-टर्म (Long-term) असर कई फैक्टर्स पर निर्भर करेगा। इन्वेस्टर्स (Investors) अगले कुछ तिमाहियों में दिल्ली में पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों की इंस्टॉलेशन (Installation) की असल रफ्तार पर नजर रख सकते हैं, ताकि यह देखा जा सके कि प्रक्रियात्मक बाधाएं हटने से प्रोजेक्ट्स कितनी तेजी से पूरे हो रहे हैं। इसके अलावा, यह देखना भी अहम होगा कि क्या अन्य राज्य रेगुलेटर्स भी PM E-DRIVE के तहत सब्सिडी एक्सेस को आसान बनाने के लिए इसी तरह के फ्रेमवर्क अपनाते हैं। अंत में, Discoms की नई कॉस्ट डेटा बुक को कुशलतापूर्वक मैनेज करने और सब्सिडी क्लेम (Claim) प्रोसेस करने की क्षमता, इस पॉलिसी शिफ्ट के जमीन पर स्मूथ इम्प्लीमेंटेशन (Smooth Implementation) का एक मुख्य संकेतक होगी।
