सऊदी अरब के प्रमुख एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद ग्लोबल क्रूड ऑयल के दाम कई हफ्तों के ऊपरी स्तर पर पहुंच गए हैं। इस भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय निवेशकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर दी है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखने लगा है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब के आभा (Abha), जाजान (Jazan) और नजरां (Najran) जैसे इलाकों में स्थित एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया है। इन हमलों में 70 से ज्यादा लोगों के हताहत होने की खबर है, जिसके बाद कई बड़े एनर्जी प्लांट्स में कामकाज को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है। सप्लाई में बाधा आने के डर से ब्रेंट (Brent) और WTI क्रूड के दाम जुलाई 2026 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं।
भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?
शेयर बाजार में इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर एनर्जी और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर दिखेगा। ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां, जो कच्चे तेल के उत्पादन में जुटी हैं, उन्हें तो ऊंची कीमतों से फायदा हो सकता है। हालांकि, निवेशक इस पर नजर रखे हुए हैं कि क्या सरकार बढ़ते मुनाफे को देखते हुए 'विंडफॉल टैक्स' (Windfall Tax) में कोई बदलाव करेगी, जो शेयरधारकों के लिए जोखिम हो सकता है।
OMCs और एविएशन सेक्टर के लिए मुश्किल
दूसरी तरफ, IOC, BPCL और HPCL जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए स्थिति कठिन है। अगर ये कंपनियां कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनके मार्केटिंग मार्जिन पर भारी दबाव पड़ेगा। वहीं, एविएशन सेक्टर की बात करें तो IndiGo जैसी कंपनियों के लिए यह बड़ा झटका हो सकता है, क्योंकि उनकी कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट का बड़ा हिस्सा एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर खर्च होता है।
इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और टायर बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे पर भी कच्चे तेल की महंगाई की मार पड़ सकती है। मैक्रो स्तर पर, भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ने से रुपया भी दबाव में आ सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। अब बाजार की नजरें सऊदी मिनिस्ट्री ऑफ एनर्जी के फैसलों पर टिकी हैं कि वे कब तक प्लांट को दोबारा शुरू कर पाएंगे।
