बिज़नेस पर सीधा असर
इस बढ़ोतरी के साथ, दिल्ली में 19 किलो का कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर अब ₹2,078.50 में मिलेगा, जो कि ₹195.50 का इजाफा है। यह कदम हॉस्पिटैलिटी, रेस्तरां और मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई व्यवसायों के लिए ऑपरेटिंग खर्चों को सीधे तौर पर बढ़ा देगा। अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत घरेलू एलपीजी के मुकाबले काफी ज्यादा हो गई है, जिससे बिज़नेस को अपनी प्राइसिंग स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
कीमतों में उछाल की वजह?
कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में यह तेज़ी मुख्य रूप से ग्लोबल क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों में आई भारी उछाल का नतीजा है। मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) कच्चे तेल के बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा रहा है। सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) जैसे Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum Corporation (BPCL) और Hindustan Petroleum Corporation (HPCL) हर महीने अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क और करेंसी एक्सचेंज रेट्स के आधार पर कमर्शियल एलपीजी के दाम तय करती हैं और इसी फॉर्मूले के तहत ये बढ़ी लागतें ग्राहकों पर डाली जा रही हैं।
घरेलू सिलेंडर क्यों हैं स्थिर?
दिलचस्प बात यह है कि जहां कमर्शियल ग्राहकों के लिए एलपीजी महंगी हुई है, वहीं घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत ₹913 (14.2 किलो) पर स्थिर बनी हुई है। इसी तरह, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें भी पिछले साल हुई मामूली कटौती के बाद से नहीं बदली हैं। यह स्ट्रेटेजी दर्शाती है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां घरेलू और ट्रांसपोर्ट फ्यूल पर कुछ लागतें खुद वहन कर रही हैं, जबकि कमर्शियल सेगमेंट से अपनी बढ़ी हुई खर्चों की भरपाई कर रही हैं।
ऑयल कंपनियों पर असर और जोखिम
सरकारी तेल कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) भी इन हालात को दर्शाता है। IOCL का मार्केट कैप ₹1.5 ट्रिलियन है, BPCL का ₹1.2 ट्रिलियन और HPCL का ₹1 ट्रिलियन है, जिनके P/E रेश्यो क्रमशः 12, 10 और 11 हैं। यह बताता है कि निवेशक वोलेटाइल क्रूड ऑयल कीमतों और सरकारी नीतियों के असर को पूरी तरह से ध्यान में रख रहे हैं।
इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ा जोखिम मध्य पूर्व की लगातार बदलती भू-राजनीतिक स्थिति है, जो तेल की कीमतों में अचानक बड़े स्पाइक्स ला सकती है। कमर्शियल दरों में तेज बढ़ोतरी और घरेलू व ट्रांसपोर्ट फ्यूल को स्थिर रखने की नीति OMCs के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बना रही है। यदि कच्चे तेल की कीमतें $90-$100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो सरकार पर घरेलू कीमतों को बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है, जो आम जनता के लिए चिंता का विषय बन सकता है।