भारत के पावर सेक्टर पर संकट के बादल छाए हैं। देश के करीब **38%** कोयला आधारित पावर प्लांट्स में ईंधन की भारी कमी हो गई है। जुलाई में जहां **35.13 मिलियन टन** कोयला स्टॉक था, वह **15 सितंबर** तक घटकर महज **21.23 मिलियन टन** रह गया है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
भारत का थर्मल पावर सेक्टर एक बड़े ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। 20 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक, 65 घरेलू कोयला आधारित पावर प्लांट्स में ईंधन का स्टॉक खतरनाक स्तर तक गिर गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि इन प्लांट्स के पास जरूरी कोयला भंडार का 25% से भी कम हिस्सा बचा है। इम्पोर्टेड कोयले पर चलने वाले प्लांट्स की स्थिति तो और भी खराब है, जहां आधे से ज्यादा प्लांट्स क्रिटिकल लेवल पर पहुंच चुके हैं।
क्यों कम हुआ कोयला स्टॉक?
इस संकट की मुख्य वजह बिजली की बढ़ती मांग और कोयले की सप्लाई के बीच का अंतर है। बिजली घरों में कोयले की खपत 8% सालाना की दर से बढ़ी है, जबकि कोयले की लोडिंग और सप्लाई में महज 3-5% की ही बढ़ोतरी हो पाई है। इसके अलावा, पूर्वी बेल्ट में भारी बारिश ने माइनिंग और ट्रांसपोर्टेशन की कमर तोड़ दी है, जिससे सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो गई है।
क्या है Coal India का प्लान?
संकट को देखते हुए Coal India ने इमरजेंसी कदम उठाए हैं। 7 सितंबर से पावर प्रोड्यूसर्स को अब रेल के बजाय सड़क मार्ग (Road Transport) से भी कोयला लाने की छूट दे दी गई है, ताकि लॉजिस्टिक्स की बाधाओं को दरकिनार किया जा सके।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के लिए अब यह देखना जरूरी है कि मानसून के बाद कोयला स्टॉक दोबारा कितनी तेजी से भरता है। पावर कंपनियां अब महंगे स्पॉट-मार्केट पावर या वैकल्पिक ईंधन पर निर्भर हो सकती हैं, जिससे उनका ऑपरेटिंग मार्जिन प्रभावित हो सकता है। आने वाले समय में पावर कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा कि वे अपनी फ्यूल सिक्योरिटी को कैसे मैनेज कर रहे हैं।
