कमजोर मॉनसून के कारण देश के हाइड्रोपावर उत्पादन में 19.5% की गिरावट आई है, जिसके चलते जून में कोयला आधारित बिजली उत्पादन 14% बढ़कर पिछले तीन सालों का रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक तेजी से घट रहा है।
क्या हुआ?
भारत का पावर सेक्टर एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। कमजोर मॉनसून की वजह से बिजली की मांग तो बढ़ी ही है, साथ ही हाइड्रोपावर (Hydropower) उत्पादन में भी भारी कमी आई है। नेशनल पावर पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, जून में हाइड्रोपावर उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 19.5% घटकर 13,361.96 मिलियन यूनिट रह गया।
इस कमी को पूरा करने के लिए देश को कोयला आधारित पावर प्लांट्स (Coal Power Plants) पर निर्भर रहना पड़ा। नतीजतन, जून में कोयला पावर उत्पादन 13.9% बढ़कर 117,677.69 मिलियन यूनिट तक पहुंच गया। यह जून महीने में पिछले तीन सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह 40% की रेनफॉल डेफिसिट (Rainfall Deficit) है, जिसने कई इलाकों के जलाशयों को प्रभावित किया है।
कोयला स्टॉक पर असर
थर्मल पावर पर बढ़ी निर्भरता की वजह से पावर प्लांट्स में कोयले के स्टॉक (Coal Stock) पर भारी दबाव पड़ा है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (Central Electricity Authority) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से मई के बीच देश के थर्मल पावर प्लांट्स ने 156.8 मिलियन टन कोयले की खपत की, जबकि सप्लाई केवल 147.2 मिलियन टन ही हो पाई। इस अंतर के चलते कोयले के स्टॉक में काफी कमी आई, क्योंकि पावर प्लांट्स पीक डिमांड (Peak Demand) को पूरा करने के लिए जूझ रहे थे, जो जून में 264.76 गीगावाट तक पहुंच गई थी। यह स्थिति भारतीय पावर ग्रिड की मौसमी कमजोरी को उजागर करती है, जो आमतौर पर शाम के पीक आवर में सोलर पावर (Solar Power) की कमी को पूरा करने के लिए हाइड्रो एनर्जी पर निर्भर करती है।
कोल इंडिया की प्रतिक्रिया
सप्लाई गैप (Supply Gap) को मैनेज करने के लिए कोयले की डिस्पैच (Coal Dispatch) को तेज कर दिया गया है। कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Ltd - CIL), जो देश के पावर सेक्टर द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लगभग 83% कोयले की सप्लाई करती है, ने जून में अपनी डिस्पैच में पिछले साल के मुकाबले 7.5% की बढ़ोतरी दर्ज की है। यह मई के 2.2% के ग्रोथ रेट से बेहतर है। इससे पता चलता है कि स्टॉक की कमी को पूरा करने के लिए प्रोडक्शन और लॉजिस्टिक्स (Logistics) को प्राथमिकता दी जा रही है। निवेशकों के लिए, मॉनसून के दौरान सप्लाई में बढ़ोतरी की क्षमता पावर ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने और बिजली की कमी को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।
जोखिम और बाजार का संदर्भ
फिलहाल पावर सेक्टर एक नाजुक स्थिति में है। कोयले पर ज्यादा निर्भरता से थर्मल पावर कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट (Operational Cost) बढ़ सकती है, खासकर अगर उन्हें सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट (Supply Contract) पूरा न होने पर ई-ऑक्शन (e-auction) या इंपोर्ट (Import) के जरिए कोयला खरीदना पड़े। इसके अलावा, अगर जुलाई में भी मॉनसून सामान्य से कम रहता है, तो सिंचाई (Irrigation) और कूलिंग (Cooling) के लिए बिजली की मांग ऊंची बनी रह सकती है, जिससे कोयला सप्लाई पर दबाव बना रहेगा। पावर और माइनिंग सेक्टर के निवेशकों को पावर प्लांट्स में कोयले के स्टॉक लेवल पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि कम स्टॉक लेवल अक्सर सरकारी माइनिंग कंपनियों पर लॉजिस्टिक्स और प्रोडक्शन टारगेट को लेकर दबाव बढ़ाता है।
