केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने पंजाब में बिजली संकट के पीछे कोयले की कमी के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। मंत्रालय का कहना है कि प्राइवेट पावर प्लांट्स को पर्याप्त सप्लाई मिल रही है, जबकि राज्य की अपनी पचवाड़ा सेंट्रल खदान में **3 लाख टन** से ज्यादा कोयला बिना उठाए पड़ा है।
सप्लाई की नहीं, मैनेजमेंट की है समस्या
मंत्रालय के मुताबिक, समस्या फ्यूल की उपलब्धता नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट की है। Nabha Power Limited और Talwandi Sabo Power Limited जैसे बड़े प्राइवेट जनरेटर्स को हर दिन औसतन 5 कोयला रैक मिल रहे हैं। सरकार के डेटा के अनुसार, यह मात्रा इन प्लांट्स की रोजाना की खपत से कहीं ज्यादा है।
पचवाड़ा खदान में फंसा कोयला
विवाद का सबसे बड़ा बिंदु पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSPCL) द्वारा संचालित पचवाड़ा सेंट्रल खदान है। 11 सितंबर 2026 तक, खदान ने अपने एनुअल टारगेट का 83.67% प्रोडक्शन कर लिया था, लेकिन कोयले की ढुलाई (Dispatch) केवल 68.44% ही रही। इस ऑपरेशनल बाधा के कारण खदान पर करीब 3.21 लाख टन कोयला बिना उठाए पड़ा हुआ है, जिसका इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता था।
पावर प्लांट्स की कम क्षमता (Plant Load Factor)
कोयला मंत्रालय ने राज्य के सरकारी पावर प्लांट्स की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाए हैं। अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, ये प्लांट 42% के बेहद कम प्लांट लोड फैक्टर (PLF) पर चल रहे थे, जबकि इनके पास जरूरत से ज्यादा कोयले का स्टॉक मौजूद था। निवेशकों के लिए यह स्थिति एक जटिल चुनौती की ओर इशारा करती है, जहां सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के बीच तालमेल की कमी बिजली आपूर्ति को प्रभावित कर रही है।
