भारत सरकार की कोल गैस//$dxa_spec_name//ification पायलट परियोजनाओं की रफ्तार बेहद धीमी है। करीब एक साल बाद भी आठों में से कोई भी प्रोजेक्ट प्लानिंग स्टेज से आगे नहीं बढ़ा है। जमीन अधिग्रहण, कोल लिंकेज और फंड की कमी के चलते इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने की उम्मीद अब **FY30** तक टाल दी गई है।
क्या हुआ?
भारत सरकार द्वारा ₹6,233 करोड़ के इंसेंटिव स्कीम के तहत आठ कोल गैस//$dxa_spec_name//ification प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दिए जाने के करीब एक साल बाद भी ज़मीनी स्तर पर कोई खास प्रगति नहीं हुई है। इस प्रोग्राम का मकसद कोल गैस//$dxa_spec_name//ification टेक्नोलॉजी की व्यावसायिक व्यवहार्यता (commercial viability) को साबित करना था, लेकिन चुने गए प्रोजेक्ट्स में से कोई भी शुरुआती प्लानिंग फेज से आगे नहीं बढ़ पाया है। अब आधिकारिक तौर पर इन प्रोजेक्ट्स के शुरू होने की समय-सीमा 2029-30 तक बढ़ा दी गई है। इस तरह की पूंजी-गहन (capital-intensive) टेक्नोलॉजी को वर्तमान माहौल में लागू करने में आ रही कठिनाइयों को बिना चालू गैस//$dxa_spec_name//ifiers जैसी फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से समझा जा सकता है।
प्रोजेक्ट्स के अमल में चुनौतियां
इन शुरुआती पहलों में कई बाधाएं आई हैं। कंपनियां जमीन अधिग्रहण में देरी और लंबी अवधि के कोल लिंकेज हासिल करने की जटिल प्रक्रिया से जूझ रही हैं। इसके अलावा, इन प्रोजेक्ट्स के लिए फाइनेंसिंग जुटाना भी मुश्किल साबित हुआ है, क्योंकि यह टेक्नोलॉजी भारत में अभी तक व्यावसायिक स्तर पर साबित नहीं हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ज्यादातर साइट्स के लिए निर्माण शुरू होने से पहले आवश्यक माने जाने वाले शुरुआती इंजीनियरिंग अध्ययन (preliminary engineering studies) भी अभी अधूरे हैं। इस वजह से ये प्रोजेक्ट्स ऑपरेशनल संपत्ति (operational assets) के बजाय काफी हद तक सैद्धांतिक (theoretical) बने हुए हैं।
इंसेंटिव का अंतर और पॉलिसी में बदलाव
सरकार ने हाल ही में ₹37,500 करोड़ की एक बड़ी इंसेंटिव स्कीम की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 75 मिलियन टन कोल गैस//$dxa_spec_name//ification क्षमता हासिल करना है। शुरुआती प्रतिभागियों के लिए चिंता का एक प्रमुख विषय यह है कि उन्हें इस नई, ज़्यादा फायदेमंद सपोर्ट प्रोग्राम से बाहर रखा गया है। इन प्रतिभागियों में कोल इंडिया (Coal India) और BHEL का संयुक्त उद्यम (joint venture), या जिंदल स्टील एंड पावर (Jindal Steel and Power) जैसी कंपनियां शामिल हैं। यह दूसरा चरण बेहतर लाभ प्रदान करता है, जिसमें प्रति प्रोजेक्ट ₹5,000 करोड़ तक का सपोर्ट और 30 साल के लिए सुनिश्चित कोल लिंकेज शामिल हैं। जिन कंपनियों ने इस टेक्नोलॉजी को जल्दी अपनाने का कदम उठाया था, वे अब भविष्य के प्रतिभागियों की तुलना में संभावित वित्तीय नुकसान में खुद को पा रही हैं।
निवेशकों के लिए इसका महत्व
इसमें शामिल कंपनियों, जिनमें पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) और जिंदल स्टील एंड पावर (Jindal Steel and Power) जैसे प्राइवेट प्लेयर्स शामिल हैं, के लिए रुकी हुई प्रगति का मतलब है कि पूंजी बिना तत्काल रिटर्न के निष्क्रिय पड़ी हुई है। इन प्रोजेक्ट्स के लिए आवश्यक कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) काफी ज्यादा है, और इंसेंटिव्स को लेकर स्पष्टता की कमी निवेश पर अपेक्षित रिटर्न (return on investment) को प्रभावित कर सकती है। निवेशकों को नीति में बदलाव पर भी ध्यान देना चाहिए, जो बड़ी स्कीम के तहत नए प्रवेशकों का पक्ष लेती है, जबकि पहली राउंड के शुरुआती लोगों को सीमित सपोर्ट मिलता है, जिससे उनके विशिष्ट प्रोजेक्ट्स की भविष्य की व्यवहार्यता के बारे में अनिश्चितता पैदा होती है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
हितधारकों (stakeholders) के लिए मुख्य निगरानी योग्य बातों में जमीन अधिग्रहण की प्रगति, कोल लिंकेज समझौतों का अंतिम रूप देना और किसी भी संभावित मंत्रालय-स्तरीय नीति संशोधन शामिल हैं जो पहली राउंड के प्रतिभागियों को बाहर रखने के मुद्दे को संबोधित कर सकते हैं। इसके अलावा, निवेशक इस बात पर भी नजर रखेंगे कि क्या सरकार मूल आठ परियोजनाओं को विस्तारित FY30 समय-सीमा के माध्यम से वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाए रखने के लिए कोई ब्रिज फाइनेंसिंग (bridge financing) या संशोधित शर्तें प्रदान करती है।
