ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट Chris Wood ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव US मिडटर्म चुनाव तक जारी रह सकता है। इससे न केवल एनर्जी मार्केट में अनिश्चितता बढ़ेगी, बल्कि भारत जैसे देशों पर इम्पोर्ट बिल और महंगाई का दबाव भी बढ़ना तय है।
एनर्जी मार्केट में क्यों है 'सिस्टमैटिक स्ट्रेस'?
आमतौर पर निवेशक सिर्फ बेंचमार्क क्रूड ऑयल पर नजर रखते हैं, लेकिन Chris Wood का मानना है कि मार्केट असल खतरे को नजरअंदाज कर रहा है—और वो है 'रिफाइंड फ्यूल' की कीमतें। पेट्रोल-डीजल की कीमतें क्रूड से अलग दिशा में जा रही हैं, जो एक बड़ा वार्निंग सिग्नल है। यूरोप जैसे इलाकों में इंडस्ट्रियल एनर्जी कॉस्ट पहले ही US के मुकाबले काफी ज्यादा है, और फ्यूल डेरिवेटिव्स की बढ़ती कीमतें इस संकट को और गहरा सकती हैं।
चीन की भूमिका पर नजर
एनर्जी मार्केट में चीन सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है। चीन ने इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर में भले ही मांग कम की हो, लेकिन उसके पास मौजूद विशाल ऑयल स्टॉकपाइल उसे कीमतों को प्रभावित करने की ताकत देता है। अगर बीजिंग अपनी खरीदारी बढ़ाता है, तो इससे ग्लोबल लेवल पर अचानक से प्राइसेस में स्पाइक आ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कच्चा तेल जरूरत का 85% से ज्यादा हिस्सा इम्पोर्ट करता है। जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते अगर एनर्जी प्राइसेस बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर भारत के इम्पोर्ट बिल पर पड़ेगा, जिससे रुपये में गिरावट और घरेलू महंगाई का जोखिम बढ़ेगा।
निवेशकों को खासकर Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL जैसे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए, जिनके मार्जिन ग्लोबल प्राइसेस के उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, एविएशन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स के ऑपरेटिंग कॉस्ट पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे उनकी तिमाही मुनाफे पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, मार्केट पार्टिसिपेंट्स को Brent crude की कीमतों और अमेरिका-ईरान के बीच के कूटनीतिक घटनाक्रमों पर कड़ी नजर रखनी होगी।
