चीन ने अपने **1.4 अरब** बैरल के विशाल स्ट्रैटेजिक रिजर्व का इस्तेमाल कर कच्चे तेल की कीमतों को काबू में रखा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच चीन ने अपने डेली इम्पोर्ट को **12.1 मिलियन** बैरल से घटाकर **8.1 मिलियन** बैरल कर दिया है, जिसका असर भारत जैसे बड़े इम्पोर्टर्स पर सीधा पड़ रहा है।
ग्लोबल ऑयल मार्केट्स में मिडिल ईस्ट के तनाव के बावजूद जो स्थिरता दिख रही है, उसके पीछे चीन की एनर्जी सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी मुख्य वजह है। चीन ने बाजार से आक्रामक खरीदारी करने के बजाय अपने भारी-भरकम स्टॉक का उपयोग करना शुरू कर दिया है। इससे ग्लोबल स्पॉट मार्केट में डिमांड कम हुई है और कीमतों में आने वाली बड़ी उछाल टल गई है।
रिजर्व का गणित
चीन के पास पिछले साल के अंत तक लगभग 1.4 अरब बैरल ऑयल का स्टॉक था। इसी भंडार के दम पर उसने अपनी डेली इम्पोर्ट वॉल्यूम में बड़ी कटौती की है। दूसरे क्वार्टर में इम्पोर्ट गिरकर 8.1 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आ गया, जो पहले क्वार्टर में 12.1 मिलियन बैरल था।
रिस्क अभी टला नहीं है
भले ही चीन ने एक बफर बना लिया हो, लेकिन मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसे रूट पर खतरा बरकरार है। अगर यहां सप्लाई चेन बाधित होती है, तो मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $95 से $120 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए मायने
भारत के लिए क्रूड ऑयल के दाम सीधे तौर पर महंगाई (Inflation), कॉर्पोरेट प्रॉफिट मार्जिन और भारतीय रुपये की चाल तय करते हैं। कच्चे तेल के दाम स्थिर रहने से भारत का ट्रेड डेफिसिट काबू में रहता है, जो ओवरऑल इकोनॉमी के लिए पॉजिटिव संकेत है। अब निवेशकों की नजर इस पर होनी चाहिए कि चीन अपने रिजर्व से और कितनी सप्लाई करता है और मिडिल ईस्ट में स्थिति आगे क्या मोड़ लेती है।
