चीन ने अपने क्लाइमेट कमिटमेंट्स को पूरा करने के लिए **2021** के बाद से **61.5 गीगावाट** के विदेशी कोल प्रोजेक्ट्स को कैंसिल कर दिया है। हालांकि, इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन में कोयले का दबदबा अब भी बरकरार है।
चीन के विदेशी कोयला प्रोजेक्ट्स को लेकर आई नई रिसर्च चौंकाने वाली है। अपनी घोषणा के पांच साल बाद, डेटा बताता है कि 2021 से अब तक पाइपलाइन में मौजूद 67% कोल कैपेसिटी यानी 61.5 गीगावाट बिजली परियोजनाओं को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के वैश्विक ऊर्जा फाइनेंसिंग मॉडल में बड़े बदलाव का संकेत है।\n\n### 'कैप्टिव पावर प्लांट' का नया दांव\n\nसरकारी लेवल पर तो कोल प्रोजेक्ट्स कम हो रहे हैं, लेकिन प्राइवेट कंपनियां अब 'कैप्टिव पावर प्लांट' का सहारा ले रही हैं। ये ऐसे कोयला आधारित प्लांट हैं जिन्हें इंडस्ट्रियल यूनिट्स, जैसे कि निकेल और एल्युमीनियम स्मेल्टर्स को बिजली देने के लिए बनाया जाता है। चूँकि इन्हें 'पब्लिक एनर्जी प्रोजेक्ट्स' के बजाय 'इंडस्ट्रियल एसेट' माना जाता है, इसलिए ये अंतरराष्ट्रीय क्लाइमेट वादों के दायरे से अक्सर बाहर रह जाते हैं।\n\n### साउथ-ईस्ट एशिया की मजबूरी\n\nइंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों के लिए ग्रीन एनर्जी की ओर कदम बढ़ाना आसान नहीं है। वहां की बढ़ती अर्थव्यवस्था को सस्ती और लगातार बिजली चाहिए, जिसकी वजह से कोयला अभी भी उनकी पहली पसंद बना हुआ है। अकेले इंडोनेशिया में 17.1 गीगावाट कोल पावर क्षमता अभी भी पाइपलाइन में है।\n\n### निवेशकों के लिए सबक\n\nइन्वेस्टर्स के लिए यहाँ दो बड़े संकेत हैं। पहला, भले ही बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर ताला लग रहा हो, लेकिन इमर्जिंग मार्केट्स में कोयले की मांग बनी रहेगी। दूसरा, बैटरी मेटल्स रिफाइनिंग जैसे एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर्स का भविष्य अभी भी कोयला-आधारित बिजली पर टिका है। ग्लोबल प्रेशर और एनर्जी सिक्योरिटी पॉलिसीज के बीच यह तालमेल आगे चलकर ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तय करेगा।
