भारत-कनाडा ऐतिहासिक डील: यूरेनियम सप्लाई और क्रिटिकल मिनरल्स पर समझौता, ट्रेड का लक्ष्य **$70 अरब**

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत-कनाडा ऐतिहासिक डील: यूरेनियम सप्लाई और क्रिटिकल मिनरल्स पर समझौता, ट्रेड का लक्ष्य **$70 अरब**
Overview

भारत और कनाडा ने यूरेनियम सप्लाई और क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) पर एक बड़ा और ऐतिहासिक समझौता किया है। इस डील से दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को नई मजबूती मिली है, खासकर ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन (Supply Chain) के मामले में।

रणनीतिक साझेदारी की नींव: ऊर्जा और संसाधनों की सुरक्षा

यह नया डेवलपमेंट भारत और कनाडा दोनों के लिए बेहद अहम है। कनाडा अपनी रिसोर्स वेल्थ (Resource Wealth) का फायदा उठाना चाहता है, वहीं भारत अपनी इंडस्ट्रियल ग्रोथ (Industrial Growth) और एनर्जी इंडिपेंडेंस (Energy Independence) को मजबूत करना चाहता है।

कनाडा की यूरेनियम डील और मिनरल्स पर फोकस

इस समझौते का मुख्य आकर्षण कनाडा की कंपनी Cameco के साथ हुआ $2.6 अरब का यूरेनियम ओर कंसन्ट्रेट सप्लाई का 9 साल का बड़ा एग्रीमेंट है। यह डील भारत के न्यूक्लियर एनर्जी (Nuclear Energy) सेक्टर के लिए बेहद खास है, जिसका लक्ष्य 2047 तक 100 GW बिजली उत्पादन क्षमता हासिल करना है। यह डील कनाडा के लिए अपने एक्सपोर्ट मार्केट्स (Export Markets) को अमेरिका के अलावा दूसरे देशों में फैलाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। कनाडा का लक्ष्य 2040 तक दुनिया भर के क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई में 14% का हिस्सा हासिल करना है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मिनरल्स की ज़रूरतें

भारत के लिए, यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) की दिशा में एक बड़ा कदम है। देश अपनी ज़रूरत का 85% से ज़्यादा क्रूड ऑयल (Crude Oil) और 50% से ज़्यादा नेचुरल गैस (Natural Gas) इम्पोर्ट करता है। भारत की अपनी यूरेनियम की ज़रूरतें बढ़ती न्यूक्लियर पावर कैपेसिटी (Nuclear Power Capacity) के लिए काफी नहीं हैं, इसलिए बाहरी सप्लाई बहुत ज़रूरी है। यह यूरेनियम डील कनाडा को एक महत्वपूर्ण सप्लायर के तौर पर स्थापित करती है। इसके साथ ही, क्रिटिकल मिनरल्स पर हुआ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU), भारत के क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन (Clean Energy Transition), इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (Electric Vehicles) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग (Advanced Manufacturing) जैसे सेक्टरों के लिए मज़बूत सप्लाई चेन बनाने में मदद करेगा। भारत लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे मिनरल्स के लिए इम्पोर्ट पर बहुत निर्भर है, और चीन का इस सेक्टर में दबदबा भारत के लिए एक बड़ा कंसर्न (Concern) है।

ट्रेड का बड़ा लक्ष्य: $70 अरब का व्यापार

संसाधनों की सुरक्षा के अलावा, यह डील द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को बढ़ाने का भी संकेत देती है। दोनों देश कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) को फाइनल करने पर ज़ोर दे रहे हैं, जिसका लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच सालाना ट्रेड को CAD 70 अरब तक ले जाना है। फिलहाल, 2024 में यह ट्रेड CAD 13.32 अरब रहा है, जो लक्ष्य की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।

सामने हैं कुछ चुनौतियां

हालांकि, इस डील में कुछ चुनौतियां भी हैं। कनाडा अपनी अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, और वहां किसी भी तरह की व्यापारिक रुकावट एक बड़ा खतरा हो सकती है। कनाडा का क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर अभी 'माइन-एंड-शिप' मॉडल पर काम कर रहा है, जिसमें वैल्यू-एडिड प्रोसेसिंग (Value-Added Processing) अक्सर दूसरे देशों, खासकर चीन में होती है। भारत की मिनरल्स के लिए इम्पोर्ट निर्भरता, जो कुछ ही देशों पर केंद्रित है, एक और बड़ी चुनौती है। CEPA को लेकर बातचीत लंबी खिंच सकती है, खासकर पिछले सालों में आए कूटनीतिक तनाव को देखते हुए।

भविष्य की राह

यह स्ट्रेटेजिक अलायंस (Strategic Alliance) भारत और कनाडा के बीच आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को गहरा करने की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मज़बूत सप्लाई चेन और डाइवर्सिफिकेशन (Diversification) पर ज़ोर, बदलती वैश्विक भू-राजनीतिक (Geopolitical) और आर्थिक परिस्थितियों का सीधा जवाब है। CEPA का सफल होना इस मज़बूत होती पार्टनरशिप की दिशा तय करेगा।

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