Central Electricity Authority (CEA) ने 2030 तक 151 कोल-फायर्ड यूनिट्स को फ्लेक्सिबल पावर सोर्सेज में बदलने का प्रस्ताव रखा है। इस बदलाव से **24 GW** की अतिरिक्त क्षमता मिलेगी, जिस पर **₹30,200 करोड़** का खर्च आने का अनुमान है। हालांकि, NTPC जैसे दिग्गज खिलाड़ियों ने इस प्रक्रिया से मशीनों में टूट-फूट और रखरखाव के खर्च को लेकर चिंता जताई है।
Central Electricity Authority (CEA) ने भारत के थर्मल पावर सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी कर ली है, ताकि सोलर और विंड एनर्जी के बढ़ते प्रभाव को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके। इस योजना के तहत 151 पुरानी कोल यूनिट्स को, जिनकी कुल क्षमता 34.5 GW है, 2030 तक फ्लेक्सिबल ऑपरेशंस के लिए तैयार किया जाएगा। इससे ग्रिड की अस्थिरता को दूर करने के लिए 24 GW की फ्लेक्सिबल पावर क्षमता अनलॉक होगी।
पारंपरिक तौर पर कोयला संयंत्र एक फिक्स्ड बेसलोड पर चलते हैं, लेकिन अब इन्हें बार-बार बंद करने और चालू करने की प्रक्रिया (Cycling) से गुजरना होगा। सरकार का मानना है कि बैटरी स्टोरेज के बजाय यह तरीका कहीं अधिक किफायती है, जिसका कुल अनुमानित खर्च ₹30,200 करोड़ है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव और रिस्क
यह प्लान भले ही रणनीतिक रूप से बेहतर दिखे, लेकिन इससे थर्मल प्लांट्स के इंफ्रास्ट्रक्चर पर गहरा असर पड़ सकता है। NTPC और अन्य इंडस्ट्री लीडर्स ने चेताया है कि बार-बार की 'साइक्लिंग' से टर्बाइन और बॉयलर्स जैसे अहम उपकरणों पर दबाव बढ़ेगा, जो इस तरह के बार-बार बदलाव के लिए नहीं बने थे। हालांकि, CEA के टेस्ट में अभी 55% लोड पर कोई बड़ी खराबी नहीं देखी गई है, लेकिन लंबी अवधि में यह मेंटेनेंस बजट और प्लांट की उम्र के लिए बड़ा रिस्क हो सकता है।
Merit Order Dispatch में सुधार
इस योजना को सफल बनाने के लिए सरकार Merit Order Dispatch (MOD) सिस्टम में बदलाव की सिफारिश कर रही है। अब तक चुनिंदा प्लांट्स पर ही सारा दबाव था, लेकिन अब इस जिम्मेदारी को कई जनरेटर्स के बीच बांटने की तैयारी है। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इन कंपनियों को इस बदलाव से होने वाली एक्स्ट्रा लागत और दक्षता में कमी की भरपाई कैसे करेगी। भविष्य में आने वाली पॉलिसीज ही इन पावर कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन की दिशा तय करेंगी।
