Central Electricity Authority (CEA) ने थर्मल पावर प्लांट्स को मैनेज करने के लिए एक नई प्लानिंग की है। रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए अब प्लांट्स की ग्रुपिंग की जाएगी, जिससे मशीनों पर पड़ने वाला बोझ और मेंटेनेंस खर्च कम होगा।
ग्रिड का बढ़ता दबाव और चुनौतियां
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) के तेजी से विस्तार के कारण नेशनल ग्रिड को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। थर्मल पावर प्लांट्स, जिन्हें मुख्य रूप से बेस-लोड पावर के लिए बनाया गया था, अब ग्रिड के उतार-चढ़ाव को संतुलित करने के लिए लगातार अपनी जनरेशन कैपेसिटी को घटाने-बढ़ाने (Ramping) पर मजबूर हैं। CEA का नया सुझाव इसी दबाव को बांटने के लिए है ताकि एक ही प्लांट पर सारा बोझ न पड़े।
क्या है 'डक कर्व' और मैकेनिकल रिस्क?
अक्सर दिन के समय जब सोलर पावर का इनफ्लो बहुत ज्यादा होता है, तो थर्मल प्लांट्स को आउटपुट घटाना पड़ता है। शाम होते ही जब मांग बढ़ती है, तो इन्हें फिर से तुरंत तेजी से उत्पादन बढ़ाना पड़ता है। इस प्रक्रिया से बॉयलर्स, टर्बाइन्स और रोटर केसिंग जैसे महंगे पार्ट्स पर काफी मैकेनिकल स्ट्रेस पड़ता है। इससे इनकी उम्र घट रही है और बार-बार खराबियां आ रही हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
पावर कंपनियों के लिए यह बदलाव फाइनेंशियल लिहाज से बेहद जरूरी है। अभी 'Deviation Settlement Mechanism' (DSM) के तहत, अगर कोई प्लांट ग्रिड की मांग के हिसाब से बिजली नहीं बढ़ा पाता, तो उस पर भारी जुर्माना लगता है। CEA का नया फ्रेमवर्क इस जुर्माने को तार्किक बनाने की कोशिश करेगा।
इसके अलावा, ग्रिड की फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाने के लिए अब पंप-स्टोरेज हाइड्रो, गैस-फायर्ड प्लांट्स और Battery Energy Storage Systems (BESS) जैसी तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में निवेशकों को कंपनियों के O&M (ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस) खर्च पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसमें होने वाली कमी सीधे तौर पर मुनाफे यानी प्रॉफिट मार्जिन को बढ़ा सकती है।
