Central Electricity Authority (CEA) ने डेटा सेंटर्स की बढ़ती बिजली मांग को मैनेज करने के लिए एक नई कमेटी का गठन किया है। साल 2031 तक यह मांग **17 गीगावाट** तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे ग्रिड की स्थिरता और सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के बढ़ते दायरे के साथ डेटा सेंटर्स की बिजली खपत में तेजी से इजाफा हो रहा है। वर्तमान में यह खपत लगभग 1.6 गीगावाट है, जो 2031-32 के फाइनेंशियल ईयर तक बढ़कर 17 गीगावाट होने की उम्मीद है। इतनी बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत को देखते हुए, स्टेट ग्रिड्स पर दबाव न बढ़े, इसके लिए एक मजबूत रेगुलेटरी और टेक्निकल फ्रेमवर्क तैयार करना जरूरी हो गया है।
ग्रिड स्टेबिलिटी की चुनौती
डेटा सेंटर्स की बिजली खपत घरों या सामान्य कमर्शियल लोड से अलग होती है। इन्हें 24/7 बिना किसी उतार-चढ़ाव वाली बिजली चाहिए होती है। कई स्टेट ग्रिड्स इस तरह के भारी और निरंतर लोड को संभालने के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए थे। इस नई कमेटी में Central Transmission Utility और Nasscom के प्रतिनिधि शामिल हैं, जो नेशनल ग्रिड में इन सेंटर्स को जोड़ने के दौरान आने वाली तकनीकी रुकावटों को सुलझाएंगे।
साइबर सुरक्षा और रिस्क
पैनल केवल ग्रिड पर ही नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। Grid-India ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल टाइम ज़ोन के साथ सिंक होने के कारण डेटा सेंटर्स में अचानक बिजली की भारी मांग बढ़ जाती है, जिससे रीजनल ग्रिड का व्यवहार अनियंत्रित हो सकता है। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में हालिया पावर ऑपरेशंस ने इस खतरे को साफ जाहिर किया है।
निवेशकों के लिए संकेत
इस कदम से पावर ट्रांसमिशन, इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग और स्मार्ट-ग्रिड टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए बड़े निवेश के रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि, सरकारी नीति में बदलाव के बाद डेटा सेंटर ऑपरेटर्स पर सख्त तकनीकी मानक और साइबर सुरक्षा नियमों का बोझ बढ़ सकता है, जिसका असर उनके कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) पर पड़ सकता है।
