मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भी Brent crude **$97.34** के पास बना हुआ है। हालांकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई **18 मिलियन** बैरल से घटकर **11 मिलियन** बैरल प्रतिदिन रह गई है, लेकिन गैर-OPEC देशों के प्रोडक्शन और चीन की मांग में कमी ने तेल की कीमतों को **$100** के पार जाने से रोक रखा है।
फिलहाल Brent crude ऑयल $97.34 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अनिश्चितता चरम पर है, लेकिन बाजार की कीमतें अभी तक $100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार नहीं कर पाई हैं। यह स्थिति एक विरोधाभास पैदा कर रही है, जहां भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risk) का असर कीमतों पर उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रहा है।
गैर-OPEC देशों का बड़ा सहारा
कीमतों में इस स्थिरता के पीछे ग्लोबल सप्लाई स्ट्रक्चर में आया बदलाव सबसे बड़ा कारण है। भले ही मिडिल ईस्ट का एक्सपोर्ट 18 मिलियन बैरल प्रतिदिन से गिरकर करीब 11 मिलियन बैरल रह गया हो, लेकिन अमेरिका, कनाडा और गुयाना जैसे गैर-OPEC देशों ने इस गैप को भरने में कामयाबी हासिल की है। इन देशों ने इस साल उत्पादन में लगभग 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी की है, जो एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहा है।
चीन की कम होती मांग
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक चीन के खपत पैटर्न में बदलाव ने भी कीमतों पर लगाम लगाई है। फरवरी से ही चीन में कच्चे तेल की शिपमेंट में कमी आई है। बीजिंग अपने 1.7 बिलियन बैरल के विशाल स्टॉकपाइल का उपयोग कर रहा है ताकि ग्लोबल प्राइस शॉक से बचा जा सके। साथ ही, चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते चलन और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर झुकाव ने तेल की लंबी अवधि की मांग को सीमित कर दिया है।
लॉजिस्टिक्स में बदलाव
तेल की आवाजाही ने भी खुद को मौजूदा संघर्ष के अनुकूल ढाल लिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जोखिम भरा होने के बावजूद, व्यापार पूरी तरह ठप नहीं हुआ है। गल्फ उत्पादक अब जहाज-से-जहाज ट्रांसफर (ship-to-ship transfer) और वैकल्पिक समुद्री मार्गों का सहारा ले रहे हैं। हालांकि इससे लागत बढ़ी है, लेकिन तेल की सप्लाई जारी है।
निवेशकों के लिए भविष्य का जोखिम
बाजार की यह स्थिरता अभी नाजुक दौर में है। सबसे बड़ा रिस्क होर्मुज जलडमरूमध्य के पूरी तरह बंद होने का है, जो कीमतों को $100 के काफी ऊपर ले जा सकता है। निवेशकों की नजर अब गैर-OPEC देशों के उत्पादन और चीन के ऑयल रिजर्व पर टिकी है, जो आने वाले समय में डिमांड-सप्लाई का संतुलन तय करेंगे।
