एआई (AI) आधारित डेटा सेंटर्स की बढ़ती मांग के बीच अब 4-घंटे का बैटरी स्टोरेज सिस्टम गैस टर्बाइन के मुकाबले ज्यादा किफायती साबित हो रहा है। भारत में रिन्यूएबल कंपनियां सप्लाई चेन की दिक्कतों को दूर करने के लिए तेजी से इस नई तकनीक की ओर रुख कर रही हैं।
डेटा सेंटर्स की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पावर इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। Wood Mackenzie की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के 43 बाजारों में 4-घंटे का बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) अब पारंपरिक गैस टर्बाइनों की तुलना में अधिक किफायती विकल्प बन गया है।
क्यों बदल रही है रणनीति?
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह दुनिया भर में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार है। डेटा सेंटर्स को लगातार बिजली की जरूरत होती है, लेकिन गैस टर्बाइनों की सप्लाई चेन इस समय काफी दबाव में है। टर्बाइनों की डिलीवरी में 2 से 4 साल का लंबा समय लग रहा है। इसके विपरीत, बैटरी स्टोरेज सिस्टम को बहुत जल्दी डिप्लॉय किया जा सकता है, जिससे कंपनियां लंबे इंतजार से बच रही हैं।
भारतीय कंपनियों के लिए मौके
भारत में डेटा सेंटर की बढ़ती क्षमता को देखते हुए Adani Green Energy और Waaree Renewable जैसी रिन्यूएबल कंपनियां पहले ही एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस पर अपना ध्यान बढ़ा रही हैं। गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव के मुकाबले बैटरी तकनीक का गिरता दाम इसे एक लॉजिकल बिजनेस निर्णय बनाता जा रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
सब कुछ इतना आसान नहीं है। निवेशकों को कुछ अहम जोखिमों पर नजर रखनी होगी:
- रेगुलेटरी बदलाव: बैटरी कंपोनेंट्स पर आयात शुल्क (Import Duty) बढ़ने से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ सकती है, जिससे मौजूदा फायदे कम हो सकते हैं।
- ग्रिड स्टेबिलिटी: तेजी से और बिना योजना के बैटरी स्टोरेज को ग्रिड के साथ जोड़ना तकनीकी मुश्किलें पैदा कर सकता है।
- स्ट्रैंडेड एसेट्स (Stranded Assets): अगर डेटा सेंटर्स की पावर डिमांड उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी, तो भारी निवेश वाले प्रोजेक्ट्स का भविष्य जोखिम में पड़ सकता है।
निवेशकों को अब कंपनियों के ऑर्डर बुक्स और कच्चे माल की बढ़ती लागत को मैनेज करने की उनकी क्षमता पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
