भारत की **₹18,100 करोड़** वाली बैटरी मैन्युफैक्चरिंग स्कीम की रफ्तार धीमी पड़ गई है। आवंटित **40 GWh** क्षमता में से फिलहाल केवल **1 GWh** ही चालू हो पाई है। निवेशकों को Ola, Reliance और ACC Energy जैसे दिग्गजों पर नजर रखनी होगी क्योंकि कच्चा माल आयात करने की मजबूरी और गिरती कीमतों ने इस प्रोजेक्ट की राह मुश्किल कर दी है।
उत्पादन और लागत की बड़ी चुनौती
भारत में बैटरी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का सरकारी सपना अब जमीन पर बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। हालांकि सरकार ने Ola Cell Technologies, Reliance New Energy, और ACC Energy Storage जैसी कंपनियों को 40 GWh की क्षमता आवंटित की है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी तक सिर्फ 1 GWh क्षमता ही चालू हो पाई है, जो तमिलनाडु में Ola की फैसिलिटी है।
इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ी बाधा आयातित कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भरता है। एनोड (Anode) और कैथोड (Cathode) जैसे कंपोनेंट्स की कुल उत्पादन लागत का 60% से अधिक हिस्सा विदेशों से आता है। इस स्थिति में नई घरेलू कंपनियों के लिए स्थापित अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से मुकाबला करना कठिन हो रहा है, जो कम लागत पर काम कर रहे हैं। साथ ही, बैटरी सेल की गिरती वैश्विक कीमतों ने नए खिलाड़ियों के मुनाफे के मार्जिन पर दबाव डाल दिया है।
टेंडर में देरी और रेगुलेटरी पेंच
सेक्टर में नीतिगत अनिश्चितता भी निवेशकों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। ग्रिड इंटीग्रेशन के लिए बैटरी सिस्टम के सरकारी टेंडर्स में भारी देरी देखने को मिल रही है। भारी उद्योग मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries) ने डेवेलपर्स के सवालों के बाद बिड की डेडलाइन को अक्टूबर से बढ़ाकर नवंबर कर दिया है। तकनीकी मानकों और रेगुलेटरी माहौल पर स्पष्टता न होने के कारण कई डेवलपर्स अभी संकोच में हैं।
निवेशकों को अब इन प्रोजेक्ट्स की प्रगति, टेंडर की टाइमलाइन और कच्चे माल की सप्लाई चेन को स्थानीय बनाने पर सरकार के रुख पर नजर रखनी चाहिए।
