बांग्लादेश ने भारत से बिजली आयात के ट्रांजेक्शन शुल्क में कटौती की है, जबकि दूसरी ओर चीन के साथ एक महंगे 'वेस्ट-टू-एनर्जी' प्रोजेक्ट पर समझौता किया है। यह कदम देश के गंभीर पावर क्राइसिस और वित्तीय दबाव को दर्शाता है।
बांग्लादेश इन दिनों अपने पावर सेक्टर के गहरे संकट को दूर करने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। हाल ही में, बांग्लादेश सरकार ने भारत से आने वाली बिजली के लिए लगने वाले 'सेटलमेंट नोडल एजेंसी' (SNA) चार्ज को ₹0.01 प्रति यूनिट से घटाकर ₹0.005 प्रति यूनिट कर दिया है। यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने और आयात खर्चों को काबू में रखने की कोशिश का हिस्सा है।\n\n### चीन के साथ महंगी डील\n\nइसी बीच, बांग्लादेश ने अमीनबाजार में 42MW के एक 'वेस्ट-टू-एनर्जी' प्रोजेक्ट के लिए चीन के साथ पावर परचेज एग्रीमेंट फाइनल किया है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस प्रोजेक्ट के तहत बिजली का टैरिफ Tk 25 प्रति यूनिट तय किया गया है, जो सामान्य आयातित बिजली (औसतन Tk 11-12 प्रति यूनिट) से दोगुने से भी ज्यादा महंगा है। सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि इस प्रोजेक्ट से कचरा प्रबंधन और जैविक खाद जैसे अतिरिक्त लाभ भी मिलेंगे।\n\n### पावर सेक्टर की चुनौतियां और भारतीय कंपनियों पर असर\n\nबांग्लादेश में प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बिजली की भारी किल्लत है। बार-बार होने वाले ब्लैकआउट का सीधा असर वहां के औद्योगिक उत्पादन पर पड़ रहा है। भारत की कई बड़ी पावर कंपनियां बांग्लादेश को बिजली सप्लाई करती हैं, इसलिए वहां की नकदी (liquidity) और पेमेंट को लेकर चल रहे दबाव का सीधा असर इन कंपनियों पर देखा जा सकता है।\n\n### भविष्य की चिंताएं\n\nचीन के साथ हुए इस प्रोजेक्ट के 2028 तक शुरू होने की उम्मीद है, लेकिन विशेषज्ञों को इसकी आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) पर संदेह है। अत्यधिक ऊंचे टैरिफ के कारण सरकारी सब्सिडी का बोझ बढ़ने का डर भी बना हुआ है। फिलहाल, निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बांग्लादेश अपनी वित्तीय सीमाओं के बीच इन महंगे प्रोजेक्ट्स और पुराने पेमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स का संतुलन कैसे बिठाता है।
