नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS Summit में एक बड़ा फैसला लिया गया है, जिसमें 'बैलेंस्ड एनर्जी ट्रांजिशन' पर सहमति बनी है। इसके तहत भारत अब रिन्यूएबल्स के साथ-साथ फॉसिल फ्यूल्स का इस्तेमाल भी जारी रख सकेगा। यह पैक्ट लोकल करेंसी में ट्रेड को बढ़ावा देकर भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को नई मजबूती देगा।
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को संपन्न हुए 18वें BRICS Summit में एक बेहद अहम ऊर्जा घोषणा पत्र जारी किया गया है। इस डिक्लेरेशन में स्पष्ट रूप से माना गया है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए फॉसिल फ्यूल्स आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह कदम भारत के लिए कूटनीतिक और नीतिगत लचीलापन लेकर आया है, जिससे भारत अपनी तत्काल ऊर्जा जरूरतों और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच एक बेहतर संतुलन बना सकेगा।
लोकल करेंसी और डॉलर पर निर्भरता
इस समझौते का सबसे मुख्य बिंदु एनर्जी ट्रेड में लोकल करेंसी का उपयोग है। भारत पहले से ही रूस से क्रूड ऑयल के लिए रुपए में भुगतान का प्रयोग कर रहा है, जिसे अब BRICS फ्रेमवर्क के जरिए और मजबूत करने की तैयारी है। अगर यह तंत्र बड़े पैमाने पर लागू होता है, तो भारत के विशाल एनर्जी इंपोर्ट बिल पर डॉलर की अस्थिरता का असर कम होगा और ट्रांजैक्शन कॉस्ट में कमी आने की उम्मीद है।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, यह रास्ता पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है। डॉलर आधारित सिस्टम से हटकर ट्रेड करने पर पश्चिमी देशों के फाइनेंशियल सिस्टम के साथ घर्षण बढ़ने का खतरा है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया (West Asia) की जियोपॉलिटिकल स्थिति अनिश्चितता का बड़ा कारण बनी हुई है। समुद्री व्यापारिक मार्गों में किसी भी तनाव से सप्लाई चेन बाधित हो सकती है, जिससे कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
क्रिटिकल मिनरल्स पर फोकस
ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत अब क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम और कॉपर पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल और एनर्जी स्टोरेज के लिए अनिवार्य हैं। चूंकि भारत में इनकी प्रोसेसिंग की कमी है, इसलिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बहुत सावधानी से आगे बढ़ाना होगा। निवेशकों के लिए आने वाले समय में रुपए में हुए ट्रेड सेटलमेंट और क्रूड इंपोर्ट की स्थिरता पर नजर रखना सबसे जरूरी होगा।
