BRICS देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ तेजी से कदम बढ़ाए हैं। मार्च से अगस्त 2026 के बीच फॉसिल फ्यूल पर खर्च बढ़कर **$330 बिलियन** पहुंच गया था, जिसके बाद अब बड़ा बदलाव जरूरी हो गया है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। 'नई दिल्ली घोषणा' के तहत अब हाइड्रोजन स्टैंडर्ड्स, स्मार्ट ग्रिड और फोटोवोल्टिक इंटीग्रेशन पर फोकस बढ़ाया जा रहा है। यह अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि इकोनॉमिक मजबूरी बन चुका है ताकि भविष्य में तेल की कीमतों के झटकों से बचा जा सके।
आर्थिक दबाव और चुनौतियां
आंकड़े बताते हैं कि मार्च से अगस्त 2026 के बीच फॉसिल फ्यूल इम्पोर्ट करने वाले देशों पर $330 बिलियन का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। अकेले भारत और चीन को $57 बिलियन का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा। क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जाने और टैंकर फ्रेट रेट में 150% तक की उछाल ने अर्थव्यवस्था में महंगाई और बढ़ती ब्याज दरों का खतरा पैदा कर दिया है।
ग्रिड की समस्या: क्या है पेच?
साल 2025 में BRICS ब्लॉक में 497 GW की नई सोलर और विंड कैपेसिटी जुड़ी है, लेकिन पुराने ट्रांसमिशन ग्रिड अब इस रफ्तार को संभालने में नाकाम हो रहे हैं। चीन में एनर्जी वेस्टेज या 'कर्टेलमेंट' 49% बढ़ गया है, और भारत में अगले फिस्कल ईयर में 35 GW से अधिक का ग्रिड कर्टेलमेंट रिस्क बना हुआ है।
निवेशकों के लिए संकेत
अब निवेशकों को केवल पावर जेनरेशन पर ध्यान नहीं देना चाहिए। असली मौका इंफ्रास्ट्रक्चर में है। हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन, स्मार्ट मीटरिंग और लार्ज-स्केल बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स इस ट्रांजिशन की सफलता तय करेंगे। अभी भी ब्लॉक कोयले और गैस पर निर्भर है, इसलिए ग्रिड अपग्रेड करने वाली कंपनियों पर नजर रखना फायदेमंद साबित हो सकता है।
