Bharat Petroleum Corporation Limited (BPCL) ने जून 2026 को समाप्त तिमाही में **₹3,962 करोड़** का कंसोलिडेटेड नेट लॉस दर्ज किया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण कंपनी के मार्केटिंग मार्जिन पर भारी दबाव पड़ा है। भले ही रेवेन्यू बढ़ा हो, लेकिन कंपनी को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर भारी अंडर-रिकवरी झेलनी पड़ी।
Detailed Coverage
ईंधन की कीमतों पर 'लॉकडाउन' का असर
Bharat Petroleum Corporation Ltd (BPCL) ने जून 2026 तिमाही के लिए ₹3,962.13 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट लॉस (consolidated net loss) घोषित किया है। यह पिछले साल की इसी अवधि के मुनाफे से एक बड़ा उलटफेर है। कंपनी पर यह वित्तीय दबाव इसलिए आया क्योंकि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद, उन्होंने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर रखीं।
रेवेन्यू बढ़ा, पर मुनाफा क्यों घटा?
तिमाही के दौरान BPCL का रेवेन्यू 23% बढ़कर ₹1,59,479.28 करोड़ हो गया। लेकिन, इस टॉप-लाइन ग्रोथ का लाभ कंपनी को नहीं मिल पाया। इसकी वजह थी पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की बिक्री पर भारी नुकसान उठाना। तेल मार्केटिंग कंपनियों ने करीब दस हफ्तों तक कीमतें नहीं बढ़ाईं, जबकि अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं।
एलपीजी पर ₹3,485 करोड़ का नुकसान
BPCL ने अकेले जून तिमाही में एलपीजी पर ₹3,485.22 करोड़ की अंडर-रिकवरी (under-recovery) दर्ज की। यह तब होता है जब कंपनियां उत्पादन और वितरण की लागत से कम कीमत पर ईंधन बेचती हैं। इतना ही नहीं, 31 मार्च 2026 तक, सरकार से BPCL को एलपीजी सब्सिडी के तौर पर ₹12,318.52 करोड़ का भुगतान लंबित था। कंपनी ने बाद में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹7.50 प्रति लीटर से अधिक और एलपीजी सिलेंडर की कीमत में ₹89 की बढ़ोतरी की, लेकिन यह बढ़ती इनपुट लागत को पूरी तरह से कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
सेक्टर पर भी दबाव
BPCL पर यह दबाव सिर्फ एक कंपनी की बात नहीं है, बल्कि यह इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों के लिए एक व्यापक चुनौती है। जब भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता आती है, तो इन कंपनियों को इसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। BPCL के ऑपरेशनल आंकड़ों में भी मामूली गिरावट देखी गई, जहां पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री 13.62 मिलियन टन रही, जो पिछले साल 13.86 मिलियन टन थी। रिफाइनरी थ्रूपुट (refinery throughput) भी घटकर 10.15 मिलियन टन रह गया, जो पहले 10.40 मिलियन टन था।
ईंधन की सीधी लागतों के अलावा, कंपनी को पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के कारण बढ़े हुए माल ढुलाई (freight rates) और बीमा प्रीमियम (insurance premiums) का भी सामना करना पड़ा। BPCL पर नज़र रखने वाले निवेशकों को कंपनी के वर्किंग कैपिटल प्रबंधन और सरकार से लंबित सब्सिडी बकाया की वसूली पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए। अगले कुछ क्वार्टर इस बात पर निर्भर करेंगे कि वैश्विक तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या नहीं और कंपनी अपने उच्च कर्ज और परिचालन लागत को कम करने के लिए बेहतर मार्जिन बनाए रख पाती है या नहीं।
