ऑस्ट्रेलिया के फॉसिल फ्यूल निर्यात ने **2016** से **2026** के बीच **12.4 अरब टन** CO2e उत्सर्जन किया है। **A$91.4 अरब** के कोयला राजस्व के दांव पर होने के कारण, अब ग्लोबल एनर्जी मार्केट और ट्रेड एग्रीमेंट्स पर भारी अनिश्चितता छा गई है।
दुनिया का एक प्रमुख कोयला और गैस सप्लायर होने के नाते, ऑस्ट्रेलिया अब अंतरराष्ट्रीय जांच के दायरे में है। तुर्की के अंतालिया में होने वाले COP31 क्लाइमेट समिट की मेजबानी से पहले, देश के घरेलू एमिशन टारगेट्स और उसके फॉसिल फ्यूल एक्सपोर्ट्स के कार्बन फुटप्रिंट के बीच का बड़ा अंतर सामने आया है। आंकड़ों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के एनर्जी एक्सपोर्ट्स से होने वाला उत्सर्जन 12.4 अरब टन CO2e तक पहुंच गया है, जो दुनिया के 44 सबसे कम विकसित देशों के कुल घरेलू उत्सर्जन से भी ज्यादा है।
इकोनॉमी बनाम क्लाइमेट
ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था का इन एक्सपोर्ट्स पर काफी अधिक दबाव है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में केवल ब्लैक कोल एक्सपोर्ट से ही ऑस्ट्रेलिया ने लगभग A$91.4 अरब की कमाई की है। वहीं, पिछले एक दशक में देश का लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) सेक्टर 73% तक बढ़ा है। सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि नेट-जीरो एनर्जी सिस्टम की ओर बढ़ते हुए, ग्लोबल लेवल पर भरोसेमंद पावर सोर्स के लिए इस ऊर्जा सुरक्षा की बहुत जरूरत है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या हैं रिस्क?
यह मुद्दा ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए भी अहम है। भारत, ऑस्ट्रेलिया से आने वाले थर्मल और कोकिंग कोल का एक प्रमुख आयातक देश है, इसलिए किसी भी नई कार्बन रेगुलेशन या ट्रेड नीति का असर एनर्जी कीमतों पर पड़ना तय है। आज के दौर में ESG (एनवायर्नमेंटल, सोशल एंड गवर्नेंस) कंप्लायंस पर जोर बढ़ रहा है, जिसके चलते एनर्जी कंपनियों को आने वाले समय में रेगुलेटरी दबाव और रेप्युटेशनल रिस्क का सामना करना पड़ सकता है। जानकारों का अनुमान है कि ये निर्यात ग्लोबल कार्बन बजट का 3.4% हिस्सा खत्म कर सकते हैं, जो 2032 तक ग्लोबल वार्मिंग को 1.5°C तक सीमित रखने के लक्ष्य को प्रभावित कर सकता है।
