भारत में ग्रीन एविएशन का भविष्य: Airbus का विज़न और हकीकत
एयरोस्पेस सेक्टर की दिग्गज कंपनी Airbus की नज़रें अब भारत पर हैं। कंपनी सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के लिए भारत को एक अहम ग्लोबल हब बनाने की संभावना देख रही है। Airbus के प्रेसिडेंट और मैनेजिंग डायरेक्टर, जुरगेन वेस्टरमेयर का मानना है कि भारत का विशाल कृषि उत्पादन, खासकर फसल अवशेष, और मजबूत इंजीनियरिंग क्षमताएं इस दिशा में बड़े मददगार साबित हो सकती हैं। यह भारत को एविएशन इंडस्ट्री को डीकार्बोनाइज करने के वैश्विक प्रयास में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना सकता है। लेकिन, इस बड़ी संभावनाओं के पीछे कई जटिल आर्थिक और लॉजिस्टिकल पहलू भी छुपे हैं, जो इस बदलाव की रफ्तार और पैमाना तय करेंगे।
कृषि उपज का फायदा: फीडस्टॉक और हकीकत
भारत हर साल लगभग 23 करोड़ टन अतिरिक्त कृषि कचरा पैदा करता है, जिसमें धान और गेहूं का भूसा बड़ी मात्रा में शामिल है। यह बायोमास, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण 'फीडस्टॉक' का काम कर सकता है, खासकर 'अल्कोहल-टू-जेट' (AtJ) जैसी तकनीकों के ज़रिए। भारत की बायोफ्यूल पॉलिसी 2018 भी पारंपरिक स्रोतों के अलावा कृषि अवशेषों को फीडस्टॉक के तौर पर इस्तेमाल करने का समर्थन करती है। सरकारी नीतियां और बायोफ्यूल मिश्रण के लक्ष्य एक सहायक माहौल बनाते हैं।
हालांकि, इस कृषि उपज को लगातार उपलब्ध और आर्थिक रूप से व्यवहार्य SAF सप्लाई चेन में बदलना आसान नहीं है। बिखरे हुए खेतों से फसल अवशेषों को इकट्ठा करना, उनके कलेक्शन की लागत और प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश, ये सब बड़ी बाधाएं हैं। किसानों को धान के भूसे के लिए ₹550 से ₹1,500 प्रति टन तक मिल सकते हैं, लेकिन इसके लिए मज़बूत सप्लाई चेन की ज़रूरत है जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। SAF की ऊंची कीमत, जो अक्सर पारंपरिक जेट फ्यूल से 2.5 से 3.5 गुना ज़्यादा होती है, इस आर्थिक समीकरण को और जटिल बनाती है। ऐसे में, सरकार की सब्सिडी या विशेष मूल्य निर्धारण तंत्र की ज़रूरत पड़ सकती है।
AI, कॉम्पिटिशन और लागत का मुद्दा
Airbus आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को एविएशन सेक्टर में एफिशिएंसी बढ़ाने, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और 'नेट-जीरो' लक्ष्य हासिल करने में मददगार मानता है। AI लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बना सकता है, लेकिन यह फीडस्टॉक की लागत या कलेक्शन की शुरुआती दिक्कतों को सीधे तौर पर हल नहीं कर सकता।
इस बीच, बोइंग (Boeing) और एम्ब्रेयर (Embraer) जैसी कंपनियां भी SAF पर तेज़ी से काम कर रही हैं। बोइंग SAF में भारी निवेश कर रहा है और 2030 तक 100% SAF पर चलने वाले विमान लाने का लक्ष्य रखता है। एम्ब्रेयर भी अपनी SAF रणनीतियों पर आगे बढ़ रही है। Airbus, जिसका मार्केट कैप लगभग 150-180 बिलियन डॉलर के बीच है, इन कॉम्पिटिटर्स के साथ ऐसे बाज़ार में है जहाँ SAF का इस्तेमाल अभी 1% से भी कम है।
आर्थिक चुनौतियाँ और जोखिम
सकारात्मक संभावनाओं के बावजूद, कई बड़ी रुकावटें हैं। सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक व्यवहार्यता है; अगर फसल अवशेषों को इकट्ठा करने और प्रोसेस करने का कोई मज़बूत बिज़नेस केस नहीं बनेगा, तो किसान उन्हें जलाना जारी रखेंगे, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ेगा। इसके अलावा, SAF का उत्पादन आज भी एक महंगा सौदा है, जो कि मज़बूत सरकारी नीतियों या बड़े प्रोत्साहन के बिना व्यापक रूप से अपनाना मुश्किल है। भारत में नीतियां मौजूद हैं, लेकिन एक परिपक्व और बड़े पैमाने पर SAF सप्लाई चेन बनाने में 'वैल्यू चेन गैप्स' हैं जो प्राइवेट सेक्टर के निवेश को रोकते हैं। Airbus की अपनी कुछ प्रशासनिक रणनीतियों में सुधार की गुंजाइश हो सकती है, जो इन योजनाओं के अमल पर असर डाल सकती है।
