अफ्रीका में सोलर एनर्जी का एक 'अदृश्य' बूम चल रहा है। साल **2026** तक **17 GW** की नई सोलर कैपेसिटी जुड़ने का अनुमान है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में यह रफ्तार पूरी तरह दर्ज नहीं हो पा रही है। डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच छोटे रूफटॉप और कमर्शियल सिस्टम इस तेजी का मुख्य इंजन बने हुए हैं।
आंकड़ों और असलियत का फासला
एनर्जी थिंक टैंक Ember और African Tech Futures Lab की रिपोर्ट बताती है कि अफ्रीका का सोलर ट्रांजिशन उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज है। सरकारी आंकड़े अक्सर केवल बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर केंद्रित रहते हैं, जबकि हकीकत यह है कि कुल सोलर क्षमता का करीब 85% हिस्सा प्राइवेट और छोटे कमर्शियल प्रोजेक्ट्स से आ रहा है। आधिकारिक डेटाबेस में लगभग 40 GW की ऑपरेशनल क्षमता का जिक्र ही नहीं है, क्योंकि ये प्रोजेक्ट्स ग्रिड एजेंसियों के साथ रजिस्टर नहीं हैं।
क्यों भाग रहे हैं लोग सोलर की तरफ?
इस तेजी की सबसे बड़ी वजह है पारंपरिक बिजली की भारी लागत। अफ्रीका में डीजल जेनरेटर से बिजली बनाने का खर्च $0.40 प्रति किलोवाट-घंटा से ज्यादा है, जबकि सोलर और स्टोरेज का विकल्प $0.10 से $0.14 प्रति किलोवाट-घंटा में ही मिल रहा है। इस भारी बचत के चलते चीन से आने वाले सोलर इक्विपमेंट्स की डिमांड आसमान छू रही है।
रिस्क और भविष्य की राह
अनियंत्रित सोलर ग्रोथ से ग्रिड मैनेजमेंट और मेंटेनेंस में चुनौतियां पैदा हो रही हैं। सही डेटा के अभाव में सरकारों के लिए ग्रिड की स्टेबिलिटी बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। इसे सुधारने के लिए South Africa ने डिजिटल जियोलोकेशन प्लेटफॉर्म्स अपनाए हैं, और Eswatini व Namibia भी 2026 के अंत तक ऐसा ही करने की योजना बना रहे हैं। भविष्य में इन्वेस्टर और कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती इस 'अदृश्य' क्षमता को सही ढांचे और रेगुलेटरी नियमों के तहत लाने की होगी।
