Adani Power के लिए वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही चुनौती भरी रही। इम्पोर्टेड कोयले की कीमतों में **50%** के उछाल के कारण कंपनी का फ्यूल खर्च बढ़कर **₹10,229 करोड़** पर पहुंच गया है। गुजरात प्रोजेक्ट्स में रेगुलेटरी देरी के कारण लागत वसूलने में हो रही दिक्कत मुनाफे पर भारी पड़ रही है।
मुनाफे पर क्यों है दबाव?
Adani Power के नतीजों में फ्यूल खर्च का बोझ साफ झलक रहा है। पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी का खर्च ₹7,216 करोड़ था, जो इस बार बढ़कर ₹10,229 करोड़ हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह इम्पोर्टेड कोयले की कीमतों में आया 50% का उछाल है।
रेगुलेटरी देरी का असर (The Lag Effect)
कंपनी के पास पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के साथ ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स हैं, जिनमें बढ़ी हुई लागत को पास-ऑन किया जा सकता है। लेकिन गुजरात प्रोजेक्ट्स में रेगुलेटरी इंडेक्सेशन मैकेनिज्म की वजह से 6 महीने से ज्यादा की देरी हो रही है। CEO एस बी ख्यालिया ने स्वीकार किया कि हालांकि प्रति यूनिट कमाई अभी भी खरीद लागत से ऊपर है, लेकिन टैरिफ एडजस्टमेंट में देरी से फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर असर पड़ रहा है।
गोड्डा प्लांट का सहारा
कंपनी का 1,600-MW का गोड्डा प्लांट (झारखंड) कुछ हद तक राहत दे रहा है। यह प्लांट बांग्लादेश को बिजली सप्लाई करता है और इसके कॉन्ट्रैक्ट इंटरनेशनल फ्यूल बेंचमार्क से सीधे जुड़े हैं। इससे ग्लोबल कीमतों में बदलाव का असर तुरंत बिलिंग में दिखता है, जिससे रिकवरी में देरी नहीं होती।
घरेलू कोयले की समस्या
सिर्फ इम्पोर्टेड कोयला ही नहीं, घरेलू कोयले की क्वालिटी ने भी कंपनी की मुश्किलें बढ़ाई हैं। मानसून के कारण कोयले में नमी (Moisture) बढ़ गई, जिससे उसकी कैलोरिफिक वैल्यू (ऊर्जा उत्पादन क्षमता) घट गई। नतीजतन, उतनी ही बिजली पैदा करने के लिए ज्यादा कोयला जलाना पड़ा, जिससे ऑपरेशनल लागत और बढ़ गई। इन अकुशलताओं की भरपाई टैरिफ रिवीजन से नहीं हो पाती, जो कंपनी के मैनेजमेंट के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
