AM Green Kakinada Project: पर्यावरण को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध, आजीविका पर खतरा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
AM Green Kakinada Project: पर्यावरण को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध, आजीविका पर खतरा

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में बन रहा AM Green का ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया प्लांट स्थानीय मछुआरों के निशाने पर आ गया है। मछुआरे इस प्रोजेक्ट से समुद्री जीवन और अपनी रोजी-रोटी पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं।

पर्यावरण और आजीविका पर खतरा?

काकीनाडा, आंध्र प्रदेश में नया ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया मैन्युफैक्चरिंग प्लांट राष्ट्रीय औद्योगिक लक्ष्यों और स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदाय के बीच तनाव का केंद्र बन गया है। AM Green Ammonia (India) Pvt Ltd के नेतृत्व वाली यह परियोजना एक प्रमुख एक्सपोर्ट हब बनने के लिए तैयार की जा रही है, जिसकी योजना ग्रीन हाइड्रोजन की क्षमता 128,000 नॉर्मल क्यूबिक मीटर प्रति घंटा और ग्रीन अमोनिया की क्षमता 1,500 टन प्रतिदिन है।

हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि मौजूदा औद्योगिक गतिविधियों के कारण उन्हें पहले से ही अपनी मछलियां पकड़ने के लिए समुद्र में काफी दूर जाना पड़ रहा है। उन्हें डर है कि नया प्लांट उनकी पारंपरिक आजीविका पर आर्थिक बोझ और बढ़ा देगा।

पर्यावरण की चिंताएं और नियमों पर सवाल

यह प्रोजेक्ट पर्यावरण समूहों के विरोध का सामना कर रहा है। 'Scientists for People' जैसे समूहों ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से प्रोजेक्ट की समीक्षा में देरी करने का आग्रह किया है। प्लांट का कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य से निकटता एक बड़ी चिंता का विषय है। आलोचकों का कहना है कि प्लांट की डिसैलिनेशन यूनिट (desalination unit) से निकलने वाले खारे पानी को समुद्र में छोड़ने से ऑक्सीजन का स्तर कम हो सकता है और समुद्री जीवन को नुकसान पहुँच सकता है।

मामले को और जटिल बनाते हुए, फिलहाल भारत में ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स को अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी से छूट मिली हुई है। AM Green ने मानक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया (public consultation process) से भी छूट मांगी है। इस छूट की स्थानीय हितधारकों द्वारा आलोचना की जा रही है, उनका तर्क है कि स्थानीय रोजगारों के विस्थापन और निर्माण व संचालन के लिए गैर-स्थानीय श्रम पर निर्भरता जैसे संभावित सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का ठीक से आकलन करने के लिए ऐसी निगरानी आवश्यक है।

निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

निवेशकों के लिए, काकीनाडा की यह स्थिति भारत के तेजी से बढ़ते ग्रीन एनर्जी सेक्टर की जटिलताओं को दर्शाती है। कंपनियां ग्रीन फ्यूल्स की वैश्विक मांग का फायदा उठाने के लिए एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सुविधाएं स्थापित कर रही हैं, लेकिन बड़े पैमाने की औद्योगिक परियोजनाओं से जुड़े सामाजिक और नियामक जोखिम महत्वपूर्ण हैं। प्रोजेक्ट की 'ग्रीन' साख बनाए रखने की क्षमता भी जांच के दायरे में है, क्योंकि ग्रे हाइड्रोजन (grey hydrogen) के संभावित उपयोग के आरोप लगे हैं, जो जीवाश्म ईंधन से बनता है, न कि नवीकरणीय ऊर्जा से।

फिलहाल, इस प्रोजेक्ट के पास REDcert सर्टिफिकेशन है, जो यूरोपीय बाजारों में ग्रीन फ्यूल्स के निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनी इन स्थानीय सामाजिक तनावों और पर्यावरणीय मांगों को बिना किसी बड़ी देरी या लागत वृद्धि के कैसे संभाल पाती है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (environmental impact assessments), सार्वजनिक परामर्श की आवश्यकताएं और ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र के लिए नियामक छूटों में किसी भी बदलाव पर भविष्य के अपडेट महत्वपूर्ण होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.