AI की भूख बढ़ी, टेक कंपनियों ने न्यूक्लियर पावर में लगाया दांव, भारत भी थोरियम पर कर रहा फोकस

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AuthorAditya Rao|Published at:
AI की भूख बढ़ी, टेक कंपनियों ने न्यूक्लियर पावर में लगाया दांव, भारत भी थोरियम पर कर रहा फोकस
Overview

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग दुनिया भर के पावर ग्रिड्स पर भारी दबाव डाल रही है। इस बिजली की भूक को शांत करने के लिए Microsoft, Google, Amazon और Meta जैसी टेक दिग्गज कंपनियाँ अब न्यूक्लियर पावर में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं, इसे अपने डेटा सेंटरों के लिए एक भरोसेमंद और कार्बन-फ्री सोर्स मान रही हैं।

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AI को चाहिए सुपर पावर! जी हां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेज़ी से बढ़ते इस्तेमाल ने बिजली की मांग को आसमान पर पहुंचा दिया है। खास तौर पर, AI के लिए ज़रूरी कंप्यूटिंग पावर के लिए डेटा सेंटरों को लगातार और भारी मात्रा में बिजली चाहिए, जो मौजूदा पावर ग्रिड्स के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

AI की बिजली की मांग और रिन्यूएबल एनर्जी की सीमाएं

AI वर्कलोड के लिए 24/7 बिजली की ज़रूरत होती है, जो कि रुक-रुक कर चलने वाली रिन्यूएबल एनर्जी (जैसे सोलर और विंड) से पूरी नहीं हो सकती। अनुमान है कि 2030 तक डेटा सेंटरों को 1,100 टेरावाट-घंटे (TWh) तक बिजली की मांग हो सकती है। इसके मुकाबले, सोलर की क्षमता 15-25% और विंड की 25-40% है, जबकि न्यूक्लियर पावर 80-90% तक क्षमता प्रदान कर सकता है और इसके लिए ज़मीन भी कम लगती है।

ग्लोबल टेक कंपनियों का न्यूक्लियर एनर्जी की ओर झुकाव

इसी वजह से, Microsoft, Amazon, Google और Meta जैसी ग्लोबल टेक दिग्गजों ने न्यूक्लियर एनर्जी को एक भरोसेमंद, कार्बन-फ्री सोर्स के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। ये कंपनियां न्यूक्लियर पावर प्लांट्स के डेवलपमेंट और एनर्जी सप्लाई के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। Microsoft 2028 तक Three Mile Island रिएक्टर को फिर से चालू करने की योजना बना रही है। Amazon अपने डेटा सेंटरों को पावर देने के लिए स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) में भारी निवेश कर रही है। Google, Kairos Power के साथ मिलकर एडवांस्ड मोल्टेन सॉल्ट रिएक्टर तकनीक पर काम कर रही है, और Meta ने TerraPower और Oklo जैसी कंपनियों से करार किए हैं। ये कदम दर्शाते हैं कि टेक कंपनियाँ अब सिर्फ बिजली की उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन की क्षमता को भी सक्रिय रूप से आकार दे रही हैं।

भारत का दांव: न्यूक्लियर पावर और थोरियम

भारत भी इस ग्लोबल ट्रेंड में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर रहा है। देश का लक्ष्य 2047 तक अपनी न्यूक्लियर क्षमता को मौजूदा करीब 8.8 GW से बढ़ाकर 100 GW तक ले जाना है। भारत दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडार का मालिक है, जिसे वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और यूरेनियम पर निर्भरता कम करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। सरकार 'SHANTI Bill' जैसे कानूनों को अपडेट कर रही है ताकि न्यूक्लियर पावर में प्राइवेट और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिल सके। रूस के साथ प्लांट विस्तार और नए साइट्स के लिए साझेदारी, और कनाडा की Cameco के साथ 2027 से 2035 तक यूरेनियम सप्लाई का समझौता, भारत की विस्तृत न्यूक्लियर एनर्जी रणनीति का हिस्सा हैं।

चुनौतियां और जोखिम

हालांकि, इस राह में बड़ी चुनौतियां भी हैं। न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाना बेहद महंगा और समय लेने वाला काम है, जिसमें अरबों डॉलर का खर्च और सालों का डेवलपमेंट लगता है। Oklo जैसी शुरुआती कंपनियों का P/E Ratio -104.02 से -122.03 के बीच है, जो मौजूदा नुकसान को दर्शाता है। चीन थोरियम रिएक्टर तकनीक में भारी निवेश कर रहा है, जबकि पश्चिमी देशों को एडवांस्ड रिएक्टर्स के उत्पादन में दिक्कत आ रही है। भू-राजनीतिक तनाव, रेगुलेटरी बाधाएं, न्यूक्लियर कचरे का प्रबंधन और रिएक्टरों की सुरक्षा प्रमुख चिंताएं बनी हुई हैं।

AI के लिए भविष्य की ऊर्जा

AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सुरक्षित, कार्बन-फ्री एनर्जी की मांग लगातार बढ़ने वाली है। कई बड़ी एनर्जी कंज्यूमिंग कंपनियां 2050 तक न्यूक्लियर क्षमता को तीन गुना करने का लक्ष्य रख रही हैं, जो डीकार्बोनाइजेशन और एनर्जी रेसिलिएंस में इसके महत्वपूर्ण रोल को दिखाता है। स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) और एडवांस्ड डिजाइन इसमें फ्लेक्सिबिलिटी और संभावित रूप से लागत कम करने में मदद कर सकते हैं। भारत का थोरियम पर फोकस उसे एक प्रमुख ग्लोबल प्लेयर बना सकता है, लेकिन इसके लिए सरकारी समर्थन, तकनीकी प्रगति और प्रभावी रेगुलेटरी व आर्थिक प्रबंधन ज़रूरी होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.