भारत के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सेक्टर के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। ग्लोबल लेवल पर कंपोनेंट की कीमतें बढ़ने के कारण करीब 12 GWh की क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स में देरी की आशंका जताई जा रही है। CRISIL Ratings के मुताबिक, साल 2025 में लगाई गई आक्रामक बोलियां अब मुनाफे पर भारी पड़ रही हैं।
मुनाफे पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सेक्टर इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। साल 2025 में डेवलपर्स ने यह मानकर काफी आक्रामक बोलियां लगाई थीं कि भविष्य में कंपोनेंट के दाम घटेंगे। हालांकि, 2026 में कीमतों में आए उछाल ने पूरे गणित को बिगाड़ दिया है। इस वजह से कई प्रोजेक्ट्स के लिए 12-14% का इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) हासिल करना मुश्किल हो गया है।
अनुभव की कमी और चुनौती
CRISIL Ratings के अनुसार, करीब 8 से 9 GWh क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स उन कंपनियों के पास हैं जिनके पास इस तरह के जटिल इक्विपमेंट प्रोक्योरमेंट का अनुभव काफी सीमित है। सोलर या विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के विपरीत, बैटरी स्टोरेज के लिए सोफिस्टिकेटेड हार्डवेयर की जरूरत होती है। विदेशी सप्लायर्स पर बढ़ती निर्भरता और सप्लाई चेन में हो रही दिक्कतें छोटे डेवलपर्स के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रही हैं।
सेक्टर पर क्या होगा असर?
फाइनेंशियल ईयर 2027 और 2028 तक भारत में कुल 50-55 GWh का पाइपलाइन प्रोजेक्ट पूरा होना है, जिसमें से करीब एक-पांचवां हिस्सा यानी 12 GWh प्रोजेक्ट्स फिलहाल दबाव में हैं। अगर डेवलपर्स समय पर कंस्ट्रक्शन पूरा नहीं कर पाते हैं, तो सरकारी नीलामी के तहत मिले इन कॉन्ट्रैक्ट्स में भारी पेनाल्टी या फिर दोबारा बातचीत (Renegotiation) जैसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या कंपनियां अपनी टाइमलाइन को बरकरार रख पाएंगी या वे बाजार में सुधार की उम्मीद में खर्च को टालेंगी।
