World Bank ने पिछले चार सालों में भारत के लिए **$36 बिलियन** की भारी पूंजी जुटाई है, जिसमें से **$9.6 बिलियन** का बड़ा हिस्सा खास तौर पर MSME सेक्टर के लिए रखा गया है।
प्राइवेट कैपिटल का बढ़ता प्रभाव
World Bank ग्रुप अब भारत में प्राइवेट सेक्टर की अगुवाई वाली ग्रोथ पर जोर दे रहा है। आंकड़ों की बात करें तो, फाइनेंशियल ईयर 2026 में यह फंड मोबिलाइजेशन बढ़कर $14.5 बिलियन पहुंच गया है, जो 2022 में महज $3 बिलियन था। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारत को 2047 तक एक अप्पर-मिडल-इनकम इकोनॉमी (upper-middle-income economy) बनाने में मदद करना है।
कैसे काम कर रही है यह फंडिंग?
इस मुहिम में वर्ल्ड बैंक की दो शाखाएं—International Finance Corporation (IFC) और Multilateral Investment Guarantee Agency (MIGA)—अहम भूमिका निभा रही हैं। ये एजेंसियां रिस्क-शेयरिंग गारंटी प्रदान करती हैं, जिससे बैंकों के लिए छोटे व्यवसायों को लोन देना आसान और कम जोखिम भरा हो जाता है।
MSME सेक्टर के लिए बड़े कदम
- RAMP पहल: $436 मिलियन की 'Raising and Accelerating MSME Performance' (RAMP) स्कीम के जरिए छोटी कंपनियों को क्रेडिट एक्सेस में मदद दी जा रही है।
- TReDS प्लेटफॉर्म का आधुनिकीकरण: अब कंपनियां अपने अनपेड इनवॉइस को बैंकों या NBFCs को बेचकर तुरंत लिक्विडिटी हासिल कर सकती हैं।
- महिला उद्यमी और ग्रीन फंड: महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी 18% तक बढ़ गई है, जिससे $1 बिलियन की पूंजी अनलॉक हुई है। वहीं, 'Green MSME Guarantee Fund' ने सर्कुलर इकोनॉमी में $40 मिलियन का निवेश आकर्षित किया है।
आने वाले समय में इन योजनाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्राउंड लेवल पर इनका क्रियान्वयन कैसे होता है। साथ ही, TReDS जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का भविष्य बड़े कॉरपोरेट बायर्स और छोटे सप्लायर्स के बीच तालमेल पर टिका है।
