भारतीय कंपनियों में कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी साल 2026 में घटकर **34%** रह गई है, जो पिछले एक दशक में पहली बड़ी गिरावट है। वहीं, लीडरशिप भूमिकाओं में यह आंकड़ा गिरकर **16.7%** हो गया है, जिसके पीछे वैश्विक स्तर पर DEI (डायवर्सिटी, इक्विटी और इंक्लूजन) नीतियों में आया बदलाव मुख्य वजह बताया जा रहा है।
पिछले एक दशक से लगातार बढ़ रही महिलाओं की भागीदारी पर ब्रेक लग गया है। Avtar Group के 'Best Companies for Women in India (BCWI)' इंडेक्स के अनुसार, साल 2025 में यह भागीदारी 36% थी, जो अब फिसलकर 34% हो गई है। यह बदलाव केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि सी-सूट (C-suite) और एग्जीक्यूटिव पदों पर भी असर डाल रहा है, जहाँ महिला प्रतिनिधित्व 20% से घटकर 16.7% पर आ गया है।
ग्लोबल पॉलिसी का असर
मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस गिरावट के पीछे अमेरिका में साल 2025 में DEI फ्रेमवर्क को लेकर हुए पॉलिसी बदलाव जिम्मेदार हैं। इन बदलावों के चलते कई मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशंस (MNCs) ने अपनी डायवर्सिटी संबंधी पहल को सीमित कर दिया है, जिसका असर भारत में काम कर रही उनकी शाखाओं पर भी दिख रहा है।
क्या सब जगह स्थिति खराब है?
सब कुछ निराशाजनक नहीं है। Hyundai Motor India जैसी कंपनियां अपने स्वतंत्र लक्ष्यों पर काम कर रही हैं और उन्होंने 2030 तक एग्जीक्यूटिव भूमिकाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग, एनर्जी और फार्मास्युटिकल सेक्टर में डायवर्सिटी को लेकर नई सक्रियता देखी जा रही है, जो IT और फाइनेंशियल सेक्टर की कमी को पूरा कर सकती है।
दक्षिण भारत के प्रमुख शहर जैसे बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद अभी भी महिला वर्कफोर्स के मामले में सबसे आगे बने हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि करीब 75% कंपनियां अभी भी डायवर्सिटी प्रोग्राम्स और प्रॉफिटेबिलिटी के बीच सीधा संबंध मानती हैं। निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कैसे कंपनियां ग्लोबल पॉलिसी और स्थानीय बाजार में टैलेंट कॉम्पिटिशन के बीच संतुलन बनाती हैं।
