भारतीय परिवारों के लिए सोना सिर्फ गहना नहीं, बल्कि महंगाई के खिलाफ एक भरोसेमंद हथियार है। Gold ETF जैसे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स होने के बावजूद, लोग फिजिकल गोल्ड को ज्यादा अहमियत क्यों दे रहे हैं?
भारतीय निवेशकों के लिए सोना सिर्फ एक जेवर नहीं, बल्कि मुसीबत के वक्त काम आने वाली पूंजी है। हालांकि लोग इसे परंपरा से जोड़कर देखते हैं, लेकिन असल में यह महंगाई (Inflation) से लड़ने और जरूरत पड़ने पर तुरंत कैश जुटाने का एक बेहद कारगर जरिया है।
क्यों नहीं ले पा रहे पेपर गोल्ड इसकी जगह?
आज के समय में Gold ETF जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इनमें एक तकनीकी पेंच है। नियमों के मुताबिक, गोल्ड ETF को अपनी कुल संपत्ति का कम से कम 80% हिस्सा फिजिकल गोल्ड के रूप में रखना पड़ता है। इसका मतलब यह है कि ये फंड्स खुद सोने की खरीदारी करते हैं, जिससे फिजिकल गोल्ड की मांग कम होने के बजाय और बढ़ जाती है। यही कारण है कि यह सरकारी खजाने (Current Account Deficit) पर दबाव कम करने में ज्यादा मददगार साबित नहीं हो पा रहे हैं।
टैक्स और आसान पहुंच की चुनौती
फिजिकल गोल्ड और डिजिटल गोल्ड के बीच सबसे बड़ी दीवार 'टैक्स' और 'इजी एक्सेस' की है। फिजिकल सोने की खरीद-फरोख्त में अक्सर कागजी कार्रवाई कम होती है, जबकि फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में डीमैट अकाउंट और टैक्स ट्रेल जैसी चीजें निवेशकों को उलझा देती हैं। सरकार को अगर लोगों की बचत को फॉर्मल फाइनेंशियल एसेट्स में लाना है, तो टैक्स नियमों को आसान और डिजिटल खरीदारी को और ज्यादा सरल बनाना होगा।
क्या REITs बन सकते हैं विकल्प?
रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) सोने के एक अच्छे विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं। प्रॉपर्टी में सीधे निवेश करना मुश्किल और खर्चीला होता है, जबकि REITs इस समस्या का समाधान देते हैं। हालांकि, अभी भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को REITs और म्यूचुअल फंड्स को सोने की तरह ही 'कोलेटरल' (Collateral) के तौर पर आसानी से स्वीकार करने की आदत डालनी होगी।
कुल मिलाकर, जब तक डिजिटल विकल्प फिजिकल गोल्ड जैसी तरलता (Liquidity) और भरोसा नहीं देंगे, तब तक भारतीय निवेशकों का रुझान असली सोने की तरफ ही बना रहेगा।
