भारतीय कंपनियां धड़ल्ले से AI टैलेंट हायर कर रही हैं, लेकिन सही स्ट्रक्चर की कमी के कारण इसका फायदा बॉटम-लाइन पर नहीं दिख रहा है। निवेशकों को अब केवल हायरिंग के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि वर्कफ्लो में हो रहे बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
हायरिंग का दिखावा और असली चुनौती
भारत में AI टैलेंट हायरिंग की रफ्तार 33% सालाना है, जो इसे ग्लोबल स्तर पर सबसे आगे रखती है। लेकिन हकीकत यह है कि कंपनियां भारी निवेश के बाद भी असली बिजनेस रिजल्ट्स हासिल करने में संघर्ष कर रही हैं। समस्या यह नहीं है कि टैलेंट कम है, बल्कि समस्या यह है कि कंपनियां AI को सिर्फ एक 'सॉफ्टवेयर अपग्रेड' मान रही हैं, जबकि इसे पूरे बिजनेस प्रोसेस में बदलने की जरूरत है।
'वैनिटी मेट्रिक्स' का जाल
ज्यादातर कंपनियां अपनी इनोवेशन क्षमता दिखाने के लिए सिर्फ हेडकाउंट बढ़ाने (हवाबाजी) पर जोर दे रही हैं, जिसे एक्सपर्ट्स 'वैनिटी मेट्रिक्स' कहते हैं। 2025 की McKinsey 'Superagency in the Workplace' रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ी रुकावट 'लीडरशिप अंडर-स्टीयरिंग' है। यानी मैनेजमेंट यह उम्मीद तो करता है कि कर्मचारी AI अपना लें, लेकिन वे यह नहीं बताते कि रोजाना काम करने के तरीके (Workflow) को कैसे बदलना है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। केवल AI एक्सपर्ट्स की भर्ती से मार्जिन नहीं सुधरेगा, बल्कि यह लागत (Cost) बढ़ा सकता है। जो कंपनियां पुराने ढर्रे पर चल रही हैं और सिर्फ हायरिंग कर रही हैं, उनके मार्जिन पर दबाव तय है। असली फायदा उन कंपनियों को मिलेगा जो यह तय कर रही हैं कि कौन सा काम मशीन को करना है और किसमें इंसानी दिमाग की जरूरत है।
आगे क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में बाजार उन कंपनियों को रिवॉर्ड देगा जो सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, बल्कि ऑपरेशनल बदलाव कर रही हैं। अर्निंग कॉल्स (Earnings Calls) के दौरान मैनेजमेंट से यह पूछना जरूरी है कि वे 'वर्कफ्लो रीडिजाइन' या 'प्रोसेस ऑटोमेशन' पर क्या कर रहे हैं। जो कंपनियां ह्यूमन-इंटीग्रेटेड प्रोसेस बनाएंगी, वही बढ़ती लागतों के बीच अपना मुनाफा बचा पाएंगी।
