Foreign Institutional Investors (FIIs) तेजी से भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह कंपनियों का महंगा वैल्यूएशन और धीमी होती अर्निंग ग्रोथ बताई जा रही है। हालांकि, डोमेस्टिक रिटेल निवेशकों की लिक्विडिटी ने फिलहाल बाजार को संभाला हुआ है।
ग्लोबल कैपिटल का बदलता रुख
भारतीय शेयर बाजार में बीते कुछ समय से विदेशी निवेशकों का नजरिया बदल गया है। जहां घरेलू निवेशकों ने SIP के जरिए बाजार को सहारा दिया है, वहीं ग्लोबल फंड मैनेजर अब स्थानीय धारणाओं से परे देख रहे हैं। विदेशी निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता 'वैल्यूएशन गैप' को लेकर है। जब किसी कंपनी के शेयर का भाव उसके वास्तविक मुनाफे (Profit Growth) से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ता है, तो वह वैल्यूएशन प्रीमियम बहुत महंगा हो जाता है, जिसे ग्लोबल निवेशक जस्टिफाई नहीं कर पाते।
पैसा वहां, जहां बेहतर रिटर्न
कैपिटल काफी मोबाइल है और ग्लोबल निवेशक लगातार अलग-अलग देशों के रिटर्न की तुलना करते हैं। अगर भारतीय मार्केट अन्य इमर्जिंग मार्केट्स के मुकाबले ज्यादा महंगा ट्रेड कर रहा है और अर्निंग में वैसा दम नहीं दिख रहा, तो विदेशी फंड उन बाजारों का रुख कर लेते हैं जहां रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न बेहतर हो। यह भारत के लॉन्ग-टर्म पोटेंशियल पर अविश्वास नहीं, बल्कि शॉर्ट-से-मीडियम टर्म में पैसे को बेहतर तरीके से काम पर लगाने की एक रणनीतिक चाल है।
रिटेल लिक्विडिटी का सहारा और भविष्य की चुनौती
घरेलू निवेशकों की लिक्विडिटी ने बाजार में भारी गिरावट को रोक रखा है। लेकिन मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर लिस्टेड कंपनियों का बिजनेस परफॉर्मेंस रफ्तार नहीं पकड़ता है, तो केवल लिक्विडिटी के दम पर कीमतों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर नहीं रखा जा सकता। सस्टेनेबिलिटी के लिए बाजार को सिर्फ लिक्विडिटी की नहीं, बल्कि रेवेन्यू और प्रॉफिट की ठोस ग्रोथ की जरूरत है।
अब आगे क्या?
भारत को ग्लोबल कैपिटल के लिए टॉप डेस्टिनेशन बने रहने के लिए टैक्स ढांचे, ट्रांजैक्शन कॉस्ट और रेगुलेटरी कंसिस्टेंसी पर ध्यान देना होगा। आने वाले समय में निवेशकों के लिए कॉर्पोरेट अर्निंग्स के नतीजे सबसे महत्वपूर्ण होंगे। यह देखना जरूरी होगा कि क्या वैल्यूएशन मल्टीपल और प्रॉफिट ग्रोथ के बीच तालमेल बैठता है या नहीं।
