व्हाइट हाउस ने PERM लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस में बड़े बदलावों को मंजूरी दे दी है। साल 2004 के बाद यह पहला मौका है जब इसमें सुधार किया गया है। नए नियमों से भारतीय IT कंपनियों के लिए भर्ती प्रक्रिया और जटिल हो सकती है, जिससे कंपनी के खर्चों में इजाफा होने की पूरी संभावना है।
अमेरिकी प्रशासन ने PERM (Program Electronic Review Management) प्रोसेस के ओवरहॉल को मंजूरी दे दी है। यह प्रक्रिया उन विदेशी कर्मचारियों के लिए पहला कदम होती है, जो अमेरिका में परमानेंट रेजिडेंसी या ग्रीन कार्ड हासिल करना चाहते हैं। हालांकि अभी रेगुलेटरी टेक्स्ट जारी नहीं हुआ है, लेकिन 2004 के बाद यह पहला बड़ा बदलाव है।
भारतीय कंपनियों पर क्यों है असर?
Infosys और Tata Group जैसी दिग्गज IT कंपनियां अपने अमेरिकी क्लाइंट्स को सर्विस देने के लिए H-1B और ग्रीन कार्ड पाइपलाइन पर निर्भर हैं। नए नियमों के तहत 'लेबर मार्केट टेस्ट' को और अधिक सख्त बनाया जा रहा है। इसका मतलब है कि विदेशी कर्मचारियों को हायर करने से पहले कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने पहले अमेरिकी नागरिकों को काम पर रखने की कोशिश की है।
बढ़ेगा कानूनी और ऑपरेशनल रिस्क
नियामक सख्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में अमेरिकी अधिकारियों ने Infosys और Tata Group समेत कई टेक कंपनियों के PERM प्रोग्राम्स को रिक्रूटमेंट में अनियमितताओं के चलते सस्पेंड किया था।
निवेशकों के लिए चुनौती यह है कि अगर नियमों के पालन में दस्तावेजीकरण (documentation) बढ़ता है या ऑडिट अधिक होते हैं, तो कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। मार्जिन बचाने के लिए कंपनियों को या तो अमेरिका में लोकल हायरिंग बढ़ानी होगी या ऑटोमेशन में निवेश करना होगा। यदि कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च को क्लाइंट्स पर नहीं डाल पाईं, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
आगे क्या होगा?
अगले कुछ दिनों में यह प्रस्ताव Federal Register में प्रकाशित होगा। इसके बाद 30 से 60 दिनों का पब्लिक कमेंट पीरियड होगा। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि फाइनल रेगुलेशंस में क्या शर्तें जोड़ी जाती हैं, क्योंकि वही भारतीय IT सेक्टर के फ्यूचर हायरिंग और कॉस्ट स्ट्रक्चर को तय करेंगी।
