पश्चिम बंगाल सरकार 2025 के एक ऐसे एक्ट को रद्द करने जा रही है जिसने औद्योगिक प्रोत्साहन (incentives) को खत्म कर दिया था। इसका मकसद निवेशकों का भरोसा फिर से जगाना है। राज्य सरकार ₹5,000 करोड़ के फंड के साथ, भूमि पूलिंग (land pooling) और रोजगार-आधारित लाभों पर ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि नए औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया जा सके।
पश्चिम बंगाल में उद्योगों को मिलेगी संजीवनी?
पश्चिम बंगाल की सरकार निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। राज्य सरकार 'Revocation of West Bengal Incentive Schemes and Obligations in the Nature of Grants & Incentives Act, 2025' को रद्द करने की तैयारी में है। यह एक्ट पिछली सरकार ने लाया था, जिसने 1993 से चली आ रही औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को बंद कर दिया था। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार का यह फैसला उन निवेशकों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा, जिन्हें अचानक प्रोत्साहन राशि मिलना बंद हो गई थी।
नई औद्योगिक नीति का खाका तैयार
राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय ने बताया है कि सरकार एक नई औद्योगिक नीति का मसौदा तैयार करने के अंतिम चरण में है। इस नई रणनीति का एक अहम हिस्सा भूमि अधिग्रहण के पुराने तरीकों को बदलना है। अब सरकार भूमि पूलिंग (land pooling) और सीधी खरीद पर ज्यादा ध्यान देगी। इस बदलाव से औद्योगिक परियोजनाओं में होने वाली देरी और स्थानीय विरोध को कम करने में मदद मिलेगी। बीते 19 अगस्त 2026 को राज्य मंत्रिमंडल ने विभिन्न औद्योगिक पार्कों में भूमि के लीजहोल्ड आवंटन को मंजूरी दी, जिससे लंबे समय से अटके प्रोजेक्ट्स को हल करने में मदद मिलेगी।
नई नीति में सिर्फ बड़े निवेश को आकर्षित करने के बजाय, ऐसे प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने पर जोर होगा जो स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करें। सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष के बजट में इन औद्योगिक पहलों का समर्थन करने के लिए पहले ही ₹5,000 करोड़ का आवंटन कर दिया है। हालांकि, इन प्रोत्साहनों को कैसे बांटा जाएगा, इसका विस्तृत खाका अभी मंत्रियों के समूह द्वारा तय किया जा रहा है।
चुनौतियां और बाजार का रुख
2025 के एक्ट को रद्द करना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन निवेशक और उद्योग जगत के लोग अभी भी थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं। पुराने भूमि अधिग्रहण मॉडल से लैंड पूलिंग में संक्रमण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें नौकरशाही और स्थानीय स्तर पर अमल की चुनौतियां आ सकती हैं। इस नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी कितनी सुरक्षित कर पाती है और आवश्यक बुनियादी ढाँचा, जैसे कि स्टील सेक्टर के लिए कोयले की दीर्घकालिक सप्लाई, मुहैया करा पाती है या नहीं।
मध्यम से लंबी अवधि के लिए, स्टील जैसे सेक्टरों का आउटलुक स्थिर बना हुआ है, हालांकि वैश्विक आर्थिक दबाव उपभोग वृद्धि को प्रभावित कर रहे हैं। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण अब नई औद्योगिक ढांचागत नीति का औपचारिक ऐलान है। बाज़ार इस बात पर बारीकी से नज़र रखेगा कि सरकार इन घोषणाओं को ज़मीनी हकीकत में कितनी तेज़ी से बदल पाती है, खासकर प्रोत्साहनों के पारदर्शी वितरण और नई भूमि आवंटन प्रक्रिया की स्थिरता के मामले में।
