पश्चिम बंगाल सरकार अब औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए अपनी जमीन अधिग्रहण रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। सरकार अब सीधे अधिग्रहण के बजाय 'नेगोशिएटेड परचेज' और 'लैंड पूलिंग' जैसे मॉडल्स पर जोर दे रही है ताकि पुरानी अड़चनों को खत्म किया जा सके।
पश्चिम बंगाल सरकार मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए अपने लैंड एक्विजिशन फ्रेमवर्क को पूरी तरह से नया रूप दे रही है। उद्योग मंत्री तापस रॉय के नेतृत्व में मंत्रियों का एक समूह (Group of Ministers) इस नई रणनीति पर काम कर रहा है, जो पारंपरिक और विवादित सरकारी अधिग्रहण मॉडल से हटकर सहयोग आधारित तरीके अपनाएगा।
सहयोग आधारित नए मॉडल्स
सरकार अब दो प्रमुख तरीकों पर ध्यान केंद्रित कर रही है:
- नेगोशिएटेड परचेज: फैक्ट्री और लॉजिस्टिक्स पार्क जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए सरकार सीधे जमीन मालिकों से बातचीत कर रही है। इसमें बाजार दर से अधिक प्रीमियम देने का प्रावधान है ताकि आपसी सहमति से जमीन का अधिग्रहण तेजी से हो सके।
- लैंड पूलिंग: इस मॉडल में जमीन मालिक अपनी जमीन सरकार को देते हैं और बदले में उन्हें विकसित प्लॉट और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर मिलता है। इससे बड़े औद्योगिक पार्क बनाना आसान हो जाएगा और विवाद की गुंजाइश कम रहेगी।
चुनौतियां और नीति की स्थिति
हालांकि सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन नई औद्योगिक और लैंड पॉलिसी की घोषणा में देरी हुई है, जिसे अगस्त 2026 तक लाने का लक्ष्य था। राज्य में जमीन के छोटे टुकड़े और 'बरगादार' (बटाईदार) जैसे जटिल स्वामित्व के दावे अभी भी एक बड़ी चुनौती हैं। इसके लिए 'वेस्ट बंगाल लैंड रिफॉर्म्स एक्ट' में कानूनी सुधारों की जरूरत है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को अब सरकार द्वारा जमीन के इस्तेमाल (land use conversion) और 'रेडी-टू-यूज़' लैंड बैंक बनाने की टाइमलाइन पर नजर रखनी चाहिए। यह बदलाव औद्योगिक विकास की गति को तो तेज कर सकता है, लेकिन जमीनों के कानूनी वेरिफिकेशन का काम अभी भी काफी समय लेने वाली प्रक्रिया बनी रहेगी।
