West Bengal में पढ़े-लिखे युवाओं के बीच बेरोजगारी दर **20%** के पार पहुंच गई है। संकट को देखते हुए सरकार ने 'Banglar Yuva Sathi' जैसी योजनाएं तो शुरू की हैं, लेकिन **₹8 लाख करोड़** से ज्यादा के बढ़ते कर्ज ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
पश्चिम बंगाल फिलहाल एक गंभीर आर्थिक दौर से गुजर रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के करीब 20.21% शिक्षित युवा बिना काम के हैं, जो शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक जरूरतों के बीच बढ़ते गैप को साफ दर्शाता है। राज्य में कॉलेजों का जाल तो बहुत बड़ा है, लेकिन फॉर्मल इकॉनमी में उस अनुपात में नौकरियां पैदा नहीं हो पा रही हैं।
सरकारी योजनाओं का बोझ
सामाजिक दबाव को कम करने के लिए सरकार ने 'Banglar Yuva Sathi' और 'Yuva Shakti Bharosa' जैसी योजनाएं लॉन्च की हैं। इसके तहत ग्रेजुएट्स को ₹3,000 और नॉन-ग्रेजुएट्स को ₹2,000 की मासिक सहायता दी जा रही है। हालांकि, यह कदम परिवारों के लिए एक सेफ्टी नेट का काम तो कर रहा है, लेकिन राज्य के खजाने पर इसका दबाव बढ़ता जा रहा है।
कर्ज का जाल और निवेश की कमी
राज्य का कुल बकाया कर्ज ₹8 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब बजट का बड़ा हिस्सा वेलफेयर स्कीमों (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) पर खर्च होता है, तो कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए गुंजाइश कम बचती है। यही कारण है कि बड़े पैमाने पर प्राइवेट इन्वेस्टमेंट आकर्षित करने में राज्य को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
आगे की राह
राज्य में अभी 'क्यू इकॉनमी' (Queue Economy) का दौर है, जहां हजारों युवा कुछ सीमित सरकारी नौकरियों के लिए कतार में खड़े हैं। विकास का असली इंजन तब चलेगा जब सरकार टेंपरेरी कैश सपोर्ट के बजाय स्ट्रक्चरल इंडस्ट्रियल ग्रोथ पर जोर देगी। अब सबकी नजरें आगामी बजट पर टिकी हैं कि क्या सरकार कर्ज कम करने और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस रोडमैप पेश करेगी या नहीं।
