वेस्ट एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने क्रूड ऑयल की कीमतों को **$120** प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है। इसका सीधा असर भारत के लॉजिस्टिक्स खर्च और ट्रेड बैलेंस पर पड़ता दिख रहा है, जिससे निवेशक अब ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन और रुपये की चाल को लेकर चिंतित हैं।
वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। अक्टूबर 2026 में क्रूड ऑयल की कीमतें $120 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो 12 साल का उच्चतम स्तर है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण माल ढुलाई का खर्च भी करीब 10 गुना तक बढ़ गया है, जिससे आयात बिल पर भारी दबाव बन रहा है।
एनर्जी कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग पर असर
क्रूड की कीमतों में उछाल सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए मुश्किल बढ़ा रहा है। इन कंपनियों को अब यह तय करना है कि वे बढ़ती लागत खुद झेलें या आम जनता पर बोझ डालें। मार्जिन पर पड़ने वाला दबाव कंपनियों की बैलेंस शीट बिगाड़ सकता है। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी परेशान है। 'ड्र्यूरी वर्ल्ड कंटेनर इंडेक्स' (Drewry World Container Index) $4,585 प्रति 40-फुट कंटेनर पर पहुंच गया है, जिससे एक्सपोर्टर्स का मुनाफ़ा कम होना तय है।
मैक्रो इकोनॉमिक जोखिम
भारत के ट्रेड डेफिसिट के बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि RBI के डिविडेंड और टैक्स कलेक्शन ने फिलहाल राहत दी है, लेकिन लगातार बढ़ती एनर्जी कॉस्ट सरकारी खजाने के लिए चुनौती बनी हुई है। निवेशकों को अब ऑटो, एफएमसीजी (FMCG) और एविएशन सेक्टर के शेयरों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ईंधन की कीमतें सीधे इनके मार्जिन को प्रभावित करती हैं। साथ ही, RBI के ब्याज दरों पर आने वाले फैसलों पर बाजार की पैनी नजर रहेगी।
