डॉलर के मुकाबले रुपया गिरकर **94** के स्तर पर पहुंच गया है, लेकिन भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्ट के लिए यह राहत नहीं ला सका है। जून **2026** में एक्सपोर्ट में **11.25%** की गिरावट दर्ज की गई है, जिसके पीछे गहरे स्ट्रक्चरल मुद्दे जिम्मेदार हैं।
भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर इस वक्त एक अजीब स्थिति से गुजर रहा है। आमतौर पर करेंसी में कमजोरी से एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलता है, लेकिन मौजूदा हालात इसके उलट हैं। जून 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, गारमेंट एक्सपोर्ट में सालाना आधार पर 11.25% की गिरावट देखी गई है, जो यह साबित करता है कि सिर्फ रुपये का कमजोर होना समस्याओं का समाधान नहीं है।
इनवर्टेड ड्यूटी का जाल (Inverted Duty Trap)
मैन्युफैक्चरर्स के लिए सबसे बड़ी बाधा 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' है। इसका मतलब है कि कच्चा माल, जैसे सिंथेटिक यार्न और केमिकल पर लगने वाला टैक्स, तैयार कपड़ों पर लगने वाले टैक्स से ज्यादा है। इससे डोमेस्टिक कंपनियों की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाती है और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के मोर्चे पर पिछड़ जाती हैं।
ग्लोबल टैरिफ का नुकसान
भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कड़ी टक्कर मिल रही है। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के पास 'प्रिफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट' हैं, जिससे उन्हें यूरोपियन यूनियन और यूके जैसे बाजारों में कम टैरिफ देना पड़ता है। भारत को इन बाजारों में ज्यादा टैरिफ चुकाना पड़ता है, जिससे रुपये की कमजोरी से मिलने वाला सारा फायदा खत्म हो जाता है।
ऑपरेशनल चुनौतियां
फैक्ट्रियों में काम करने की क्षमता फिलहाल 58% से 70% के बीच सिमट कर रह गई है। इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण कंपनियों को महंगे एयर फ्रेट का सहारा लेना पड़ रहा है, जो उनके पतले मार्जिन (Margins) को और भी कम कर देता है।
निवेशकों के लिए जरूरी संकेत
टेक्सटाइल सेक्टर की रिकवरी के लिए केवल करेंसी मूवमेंट काफी नहीं है। निवेशकों को सरकार द्वारा ड्यूटी स्ट्रक्चर में सुधार, GST रिफंड सेटलमेंट की गति और एक्सपोर्ट इंसेंटिव स्कीमों पर नजर रखनी चाहिए। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि कंपनियां अपनी फैक्ट्री एफिशिएंसी और वर्किंग कैपिटल की समस्याओं को कैसे हल करती हैं।
