अमेरिकी कांग्रेसी राजा कृष्णमूर्ति ने चेतावनी दी है कि H-1B वीज़ा के लिए प्रस्तावित **$100,000 (लगभग ₹83 लाख)** की फीस नौकरियों को विदेशों में भेज सकती है। हालांकि, यह नीति फिलहाल लागू नहीं है। एक अमेरिकी संघीय अदालत ने जून 2026 में फीस रद्द कर दी थी, और अपीलीय अदालत ने जुलाई में इसे फिर से लागू करने की सरकार की अर्जी खारिज कर दी। निवेशकों को इस स्थिति पर नज़र रखनी चाहिए क्योंकि यह प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों के लिए दीर्घकालिक कार्यबल योजना और परिचालन लागत को प्रभावित करती है।
H-1B वीज़ा पर ₹83 लाख की फीस का मामला
अमेरिकी कांग्रेसी राजा कृष्णमूर्ति ने H-1B वीज़ा आवेदन पर प्रस्तावित $100,000 की फीस के नकारात्मक प्रभाव के बारे में चिंता जताई है। उन्होंने तर्क दिया कि इतनी अधिक लागत अमेरिकी कंपनियों को अपना कामकाज विदेशों में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर करेगी, क्योंकि विदेशी तकनीकी प्रतिभाओं को काम पर रखने का खर्च बहुत भारी होगा। इससे संयुक्त राज्य अमेरिका में महत्वपूर्ण तकनीकी भूमिकाओं के लिए उपलब्ध कुशल श्रमिकों की संख्या कम हो सकती है।
फिलहाल क्या है हकीकत?
हालांकि, निवेशकों और भारतीय आईटी कंपनियों के लिए, जमीनी हकीकत इस चेतावनी से अलग है। अगस्त 2026 तक, $100,000 की फीस नहीं ली जा रही है। एक अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने 8 जून, 2026 को इस नीति के खिलाफ फैसला सुनाया था, जिसने प्रभावी रूप से फीस को रद्द कर दिया था। इसके बाद, अमेरिकी सरकार ने अदालत के फैसले पर रोक लगाने की कोशिश की, लेकिन एक फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स पैनल ने 24 जुलाई, 2026 को उस अर्जी को खारिज कर दिया। इसका मतलब है कि फिलहाल, वीज़ा आवेदकों पर यह फीस नहीं लगाई जा सकती है।
भारतीय आईटी कंपनियों को राहत
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएलटेक (HCLTech) और टेक महिंद्रा (Tech Mahindra) जैसी प्रमुख भारतीय आईटी सेवा प्रदाताओं के लिए, यह कानूनी स्थिति एक महत्वपूर्ण संभावित लागत से अस्थायी राहत प्रदान करती है। ये कंपनियां क्लाइंट प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए इंजीनियरों और सलाहकारों को अमेरिका भेजने के लिए H-1B वीज़ा पर निर्भर करती हैं। प्रति वीज़ा $100,000 की फीस उनके अमेरिकी परिचालन की लागत संरचना को नाटकीय रूप से बदल देती, और संभवतः उन्हें अपने बिजनेस मॉडल को समायोजित करने या ग्राहकों पर लागत डालने के लिए मजबूर करती।
आगे क्या?
हालांकि H-1B वीज़ा की यह विशेष फीस फिलहाल रुकी हुई है, स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। ऐसी खबरें हैं कि प्रशासन वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण (OPT) कार्यक्रम, जो अंतरराष्ट्रीय छात्रों को स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है, पर भी इसी तरह की फीस संरचनाएं लागू करने पर विचार कर रहा है। यह उन कंपनियों के लिए अनिश्चितता की एक परत जोड़ता है जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों से बड़ी संख्या में भर्ती करती हैं।
निवेशकों के लिए मुख्य निगरानी बिंदु चल रही कानूनी लड़ाई और सरकार द्वारा इन शुल्कों को फिर से शुरू करने या उन्हें कहीं और पेश करने के किसी भी भविष्य के प्रयासों पर है। जब तक अदालतों में अंतिम, दीर्घकालिक समाधान नहीं हो जाता, तब तक कंपनियों को कार्यबल योजना और भारत तथा अमेरिका के बीच प्रतिभाओं को स्थानांतरित करने की क्षमता के संबंध में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बाज़ार प्रतिभागी वीज़ा नियमों या OPT कार्यक्रम के प्रति प्रशासन के दृष्टिकोण में किसी भी बदलाव के संबंध में किसी भी नई नीति घोषणाओं पर नज़र रखेंगे।
