US में बेरोजगारी के नए दावे (initial jobless claims) गिरकर **197,000** पर आ गए हैं, जो जुलाई के मध्य के बाद सबसे निचला स्तर है। यह आंकड़ा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती का संकेत है, लेकिन ब्याज दरों पर इसके असर को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका का लेबर मार्केट उम्मीद से कहीं अधिक मजबूत साबित हो रहा है। 26 सितंबर 2026 को समाप्त हुए सप्ताह में शुरुआती बेरोजगारी के दावे गिरकर 197,000 रह गए, जो पिछले सप्ताह के संशोधित 198,000 के आंकड़ों से भी कम है। यह जुलाई के बाद का सबसे बेहतर प्रदर्शन है, जो दिखाता है कि अमेरिकी कंपनियां आर्थिक चुनौतियों के बावजूद कर्मचारियों को बनाए रखने पर जोर दे रही हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारतीय बाजार के नजरिए से देखें तो मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था हमारे IT सेक्टर के लिए एक अच्छे संकेत की तरह है। जब अमेरिकी कंपनियां ग्रोथ को लेकर कॉन्फिडेंट होती हैं, तो वे आउटसोर्सिंग कॉन्ट्रैक्ट्स में कटौती नहीं करतीं, जिससे भारतीय IT एक्सपोर्टर्स की आय पर सकारात्मक असर पड़ता है। चार सप्ताह की मूविंग एवरेज में भी गिरावट आई है, जो यह साबित करता है कि रोजगार का यह स्थिर ट्रेंड कोई अस्थायी नहीं है।
ब्याज दरों और महंगाई का गणित
हालांकि, लेबर मार्केट की यह मजबूती एक उलझन भी पैदा करती है। अगर अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत बनी रहती है, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती (rate cuts) करने से बच सकता है। इससे ग्लोबल कैपिटल फ्लो और स्टॉक वैल्यूएशन पर दबाव बन सकता है।
इसके अलावा, मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान संकट, ने एनर्जी की कीमतों को बढ़ा दिया है। इससे ग्लोबल महंगाई (inflation) बढ़ने का खतरा बना हुआ है, जो भारत जैसी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के मार्जिन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। फिलहाल, 'कंटीन्यूइंग क्लेम्स' भी घटकर 17.01 लाख रह गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि लोग तेजी से नई नौकरियां पा रहे हैं। अब निवेशकों की नजरें अगले महीने आने वाले एंप्लॉयमेंट डेटा पर टिकी होंगी।
